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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २६५ मेरे मन को अपने वश मे कर लिया है और इन्ही के कारण मेरा सारा प्राप्त किया हुआ सुख छू-मन्तर-हो गया है । सवैया प्रेम मरोरि उठै तब ही मन पाग मरोरनि मे उरभावै । रूसे से ह्रै दृग मोसो रहै लखि मोहन मूरति मो पै न आवै ॥ बोले बिना नहि चैन परै रसखानि सुने कल श्रौनन पावै । भौंह मरोरिबो री रुसिबो झुकिबो पिय सो सजनी सिखरावै ॥१७२॥ शब्दार्थ—पाग मरोरनि मे = पगडी के घुमावो मे। रूसे से = रूठे हुए से । श्रोनन = कान । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब भी वह अपनी पगड़ी के घुमावो मे मेरे मन को उलझाता है, तभी मेरा प्रेम सजग उठता है। मेरे नेत्र मुझसे रूठे हुए से रहते है और वे कृष्ण को देख कर मेरे वश मे नही रहते । कृष्ण की बाते सुने बिना मुझे चैन नही पडता, तथा उसकी बाते सुनने पर कानो को आनन्द प्राप्त होता है । यह सुन कर उसकी सखी ने प्रियतम से भौंह मोडने की, वक्र दृष्टि से देखने की, रूठने की तथा फिर मान जाने की शिक्षा दी । विशेष-अनुभावो की सुन्दर योजना है। सवैया बागन मे मुरली रसखान सुनी सुनिकै जिय रीझ पचैगौ । धीर समीर को नीर भरौ नहि माइ भकै श्रौ बबा सकुचैगौ ॥ आली दुरैधे को चोटनि नैम कहौ अब कौन उपाय बचैगौ । जायबौ भाँति कहाँ घर सो परसों वह रास परोस रचैगौ ॥१७३॥ शब्दार्थ—रीझि पचैगौ = प्रेम के वशीभूत हो जायेगा । धीर समीर = वृन्दावन का एक कु ञ्ज । भकै = झकझक करना । दुरैधे = निर्लज्ज । नैम = नियम । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपनी आसक्ति का सकेत देती हुई अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! बागो मे कृष्ण की मुरली की ध्वनि को सुन कर यह मन प्रेम के वशीभूत हो जायेगा । धीर समीर से पानी भरकर न लाने के कारण सास झक-झक करेगी और बाबा शर्म से सकुचा जायेगे । हे सखि ! उस निर्लज्ज कृष्ण की चोटो से कुल की मर्यादा का नियम किस प्रकार