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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२६६ रसखान-ग्रन्थावली बच सकता है ? अब घर से भी किस प्रकार कहाँ चली जाऊँ, क्योकि परसो ही वह हमारे पडौस मे अपनी रासलीला करेगा । विशेष—यह सवैया श्रीविश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया वेनु बजावत गोधन गावत ग्वालन सग गली मधि आयो । बासुरी मै उनि मेरोई नाँव सुग्वालिनि के मिस टेरि सुनायो ॥ ए सजनी सुनि सास के त्रासनि नन्द के पास उसास न आयो । कैसी करौं रसखानि नही हित चैनन ही चितचोर चुरायो ॥१७४॥ शब्दार्थ—मेरोई नाँव = मेरा ही नाम । मिस = बहाने से । त्रासनि = डर से । नद = ननद । अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कह रही है कि हे सखि ! बंशी बजाता हुआ, गोचारण के गीत गाता हुआ अन्य ग्वालो के साथ जब कृष्ण मेरी गली मे आया तो उसने सुग्वालिन के वहाने से बाँसुरी मे मेरा नाम बजाकर सुनाया । हे सजनी । अपने नाम को सुनकर मै तो सास के डर से इतनी डर गई कि मुझे अपनी ननद के पास भी ठीक तरह से साँस नही आये । आनन्द-सागर कृष्ण ने यह कैसी बात कर दी, इसमे मेरा भला नही है, क्योकि उस चितचोर ने मेरे सुख को भी चुरा लिया है, अर्थात् जब से बाँसुरी मे उसने मेरा नाम बजाया है, तब से मै उसके प्रेम मे इतनी डूब गई हूँ कि मुझे पलभर के लिए भी चैन नही मिलता । मेरा मन हर समय कृष्ण के लिए ही तडपता रहता है । सोरठा एरी चतुर सुजान, भयी अजान हि जान कै । तजि दीनी पहचान, जान अपनी जान कौं ॥ १७५ ॥ शब्दार्थ—सुजान = प्रिय । जान = जानकर । जानको = प्रिया को । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! वह चतुर प्रिय मुझे जानकर भी अजान बना हुआ है, अर्थात् उसने मेरी पूर्णतया उपेक्षा कर दी है । अपनी प्रिया मुझसे गहरा सम्बन्ध बनाकर भी वह आज मुझे पहिचा- नता भी नही है । विशेष—यमक, विरोधाभास अलकार ।