रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
देखे ते नेकु सम्भार रहै न तबै झुकि के लखि लोग लजावै । चैन नही रसखानि दुहूँ विधि भूली सबै न कछू बनि आवै ॥ १६८॥ शब्दार्थ—कल जातें परै = जिससे सुख हो । नेकु = तनिक । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरा मन कृष्ण से लग गया है जिसके कारण मैं सदैव व्याकुल रहती हूँ। मेरी यह व्याकुलता नष्ट हो और मुझे सुख मिले, ऐसी विधि मुझे कोई नहीं बताता । कृष्ण की मूर्ति को देखे बिना मुझे व्याकुलता रहती है। भूख भाग जाती है, अर्थात् कुछ भी खाने को मन नही करता और न आभूषण ही मुझे अच्छे लगते हैं। किन्तु जब मैं उन्हे देख लेती हूँ तो अपने को तनिक भी नहीं सँभाल पाती, तब उसके सामने मुझे झुकी देखकर लोग मुझे लज्जित करते हैं। रसखान कहते हैं कि मुझे दोनो प्रकार से चैन नही है। उनके देखने पर और न देखने पर मैं सब कुछ भूल जाती हूँ और उस समय मुझे कोई उपाय नहीं सूझता। सवैया भई बावरी ढूँढति वाहि तिया अरी लाल ही लाल भयौ कहा तेरो । ग्रीवा ते छूटि गयौ अबही रसखानि तज्यौ घर मारग हेरो ॥ डरियै कहै माय हमारी बुरी हिय नेकु न सूनो सहै छिन मेरो । काहे को खाइबो जाइबो है सजनी अनखाइबो सीस सहेरो ॥ १६६ ॥ शब्दार्थ—लाल = रत्न । लाल = कृष्ण । ग्रीवा = गर्दन, हृदय । माय = सासु । अनखाइबो = डाँट-फटकार । सहेरो = सहना ही पड़ेगी । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के विरह में पागल सी हो गई है । उसकी सखी उससे उस स्थिति का कारण पूछती है तो वह कुशलता से और बाते उसे बताती है । दूसरी सखी पूछती है कि हे सखि ! तुम पागल सी बनकर किसको ढूँढ रही हो ? वह उत्तर देती है—मेरे हार का रत्न टूट कर गिर गया है । वह अभी-अभी मेरी गर्दन से छूट कर गिर गया है । मैंने घर तक का मार्ग ढूँढ़ लिया है, लेकिन वह मिला ही नहीं । यह सुन कर उसकी सखी कहती है—तब इसमे डरने की क्या बात है ? वह उत्तर देती है—मेरी सासु बहुत बुरी है, वह मेरे हृदय को क्षणभर के लिए भी सूना नहीं देख सकती । अब तो उसका पाना-पाना क्या है । अब तो मुझे सासु की डाँट-फटकार सहनी ही पड़ेगी ।
विशेष-१ वाग्वैदग्ध्य की सुन्दर योजना है। २. लाल शब्द के प्रयोग मे यमक अलंकार है। सवैया मो मन मोहन कों मिलि कै सबहीं मुसकानि दिखाइ दई। वह मोहनी मूरति रूपमई सबही चितई तब ही चितई ॥ उन तौ अपने अपने घर की रसखानि चली विधि राह लई । कछु मोहि को पाप पर्यो पल मैं पग पावत पौरि पहार भई ॥ १७०॥ शब्दार्थ-रूपमई = सौन्दर्य युक्त । चितई = देखना । पग पावत पौरि पहार भई = पैदल अपने घर तक पहुँचना पहाड बन गया । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने अनुराग को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरा मन जब मोहन के मन से मिला; अर्थात् जब मुझे कृष्ण के प्रति प्रेम हुआ तो सारी सखियाँ मुस्करा दीं। वास्त- विकता तो यह है कि कृष्ण की सौन्दर्यमयी मूर्ति को जब सब अन्य सखियों ने देखा था तो मैंने भी देखा था । रसखान कहते हैं कि वे सब तो अपने-अपने घर अच्छी तरह से पहुँच गईं, पर मुझे ही पल भर मे यह पाप लगा है कि पैदल अपने घर तक पहुँचना मेरे लिए पहाड बन गया, अर्थात् बहुत कठिन हो गया। सवैया डोलिवो कुंजनि कुंजनि को अरु वेनु बजाइवो धेनु चरैवो । मोहिनी ताननि सो रसखानि सखानि के संग को गोधन गैवो ॥ ये सब डारि दिये मन मारि विसारि दयौ सगरौ सुख पैवो । भूलत क्यो करि नेहन ही को 'दही' करिवो मुसकाई चितैवो ॥ १७१॥ शब्दार्थ-वेनु = वेणु वंशी । मोहिनी = मोहित करने वाली । रसखानि = आनन्द-सागर कृष्ण । गोधन = गोचारण के गीत । अर्थ - एक गोपी अपने हृदय मे उमड़े हुए कृष्ण-प्रेम का वर्णन अपनी सखी से करती है कि आनन्द-सागर कृष्ण का कुन्ज-कुन्ज मे घूमना, वंशी बजाना गौएँ चराना, मोहित करने वाली ताने सुनाना, अपने साथियो के साथ गोचा- रण के गीत गाना, प्रेम से दही मांगना और मुस्करा कर देखना कैसे भूला जा सकता है ? अर्थात् कृष्ण की ये सब क्रीड़ाएँ मेरे मन मे गड़ गई हैं। इन्होने
व्याख्या भाग २६५ मेरे मन को अपने वश मे कर लिया है और इन्ही के कारण मेरा सारा प्राप्त किया हुआ सुख छू-मन्तर-हो गया है । सवैया प्रेम मरोरि उठै तब ही मन पाग मरोरनि मे उरभावै । रूसे से ह्रै दृग मोसो रहै लखि मोहन मूरति मो पै न आवै ॥ बोले बिना नहि चैन परै रसखानि सुने कल श्रौनन पावै । भौंह मरोरिबो री रुसिबो झुकिबो पिय सो सजनी सिखरावै ॥१७२॥ शब्दार्थ—पाग मरोरनि मे = पगडी के घुमावो मे। रूसे से = रूठे हुए से । श्रोनन = कान । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब भी वह अपनी पगड़ी के घुमावो मे मेरे मन को उलझाता है, तभी मेरा प्रेम सजग उठता है। मेरे नेत्र मुझसे रूठे हुए से रहते है और वे कृष्ण को देख कर मेरे वश मे नही रहते । कृष्ण की बाते सुने बिना मुझे चैन नही पडता, तथा उसकी बाते सुनने पर कानो को आनन्द प्राप्त होता है । यह सुन कर उसकी सखी ने प्रियतम से भौंह मोडने की, वक्र दृष्टि से देखने की, रूठने की तथा फिर मान जाने की शिक्षा दी । विशेष-अनुभावो की सुन्दर योजना है। सवैया बागन मे मुरली रसखान सुनी सुनिकै जिय रीझ पचैगौ । धीर समीर को नीर भरौ नहि माइ भकै श्रौ बबा सकुचैगौ ॥ आली दुरैधे को चोटनि नैम कहौ अब कौन उपाय बचैगौ । जायबौ भाँति कहाँ घर सो परसों वह रास परोस रचैगौ ॥१७३॥ शब्दार्थ—रीझि पचैगौ = प्रेम के वशीभूत हो जायेगा । धीर समीर = वृन्दावन का एक कु ञ्ज । भकै = झकझक करना । दुरैधे = निर्लज्ज । नैम = नियम । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपनी आसक्ति का सकेत देती हुई अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! बागो मे कृष्ण की मुरली की ध्वनि को सुन कर यह मन प्रेम के वशीभूत हो जायेगा । धीर समीर से पानी भरकर न लाने के कारण सास झक-झक करेगी और बाबा शर्म से सकुचा जायेगे । हे सखि ! उस निर्लज्ज कृष्ण की चोटो से कुल की मर्यादा का नियम किस प्रकार
२६६ रसखान-ग्रन्थावली बच सकता है ? अब घर से भी किस प्रकार कहाँ चली जाऊँ, क्योकि परसो ही वह हमारे पडौस मे अपनी रासलीला करेगा । विशेष—यह सवैया श्रीविश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया वेनु बजावत गोधन गावत ग्वालन सग गली मधि आयो । बासुरी मै उनि मेरोई नाँव सुग्वालिनि के मिस टेरि सुनायो ॥ ए सजनी सुनि सास के त्रासनि नन्द के पास उसास न आयो । कैसी करौं रसखानि नही हित चैनन ही चितचोर चुरायो ॥१७४॥ शब्दार्थ—मेरोई नाँव = मेरा ही नाम । मिस = बहाने से । त्रासनि = डर से । नद = ननद । अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कह रही है कि हे सखि ! बंशी बजाता हुआ, गोचारण के गीत गाता हुआ अन्य ग्वालो के साथ जब कृष्ण मेरी गली मे आया तो उसने सुग्वालिन के वहाने से बाँसुरी मे मेरा नाम बजाकर सुनाया । हे सजनी । अपने नाम को सुनकर मै तो सास के डर से इतनी डर गई कि मुझे अपनी ननद के पास भी ठीक तरह से साँस नही आये । आनन्द-सागर कृष्ण ने यह कैसी बात कर दी, इसमे मेरा भला नही है, क्योकि उस चितचोर ने मेरे सुख को भी चुरा लिया है, अर्थात् जब से बाँसुरी मे उसने मेरा नाम बजाया है, तब से मै उसके प्रेम मे इतनी डूब गई हूँ कि मुझे पलभर के लिए भी चैन नही मिलता । मेरा मन हर समय कृष्ण के लिए ही तडपता रहता है । सोरठा एरी चतुर सुजान, भयी अजान हि जान कै । तजि दीनी पहचान, जान अपनी जान कौं ॥ १७५ ॥ शब्दार्थ—सुजान = प्रिय । जान = जानकर । जानको = प्रिया को । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! वह चतुर प्रिय मुझे जानकर भी अजान बना हुआ है, अर्थात् उसने मेरी पूर्णतया उपेक्षा कर दी है । अपनी प्रिया मुझसे गहरा सम्बन्ध बनाकर भी वह आज मुझे पहिचा- नता भी नही है । विशेष—यमक, विरोधाभास अलकार ।
व्याख्या भाग २६७. सवैया पूरब पुंन्यनि ते चितई जिन ये अँखियाँ मुसकानि भरी जू । कोऊ रही पुतरी सी खरी कोऊ घाट डरी कोऊ वाट परी जू ॥ जे अपने घरही रसखानि कहै अरु हौसनि जाति मरी जू । लाल जे बाल विहाल करी ते निहाल करी न निहाल करी जू ॥१७६॥ शब्दार्थ—चितई=देखी । पुतरी=काठ की पुतली । हौसनि=प्रसन्नता- भरी लालसाएँ । बिहाल=व्याकुल । निहाल=प्रसन्न । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण की हँसी भरी आँखों को जो बालाएँ देख पाईं, यह उनके पूर्व जन्मो के पुण्यो का ही फल था । उन मुस्कान-भरी आँखों को देखकर कोई तो काठ की पुतली की तरह निश्चेष्ट खडी रही, कोई घाट पर डर गई और कोई अपनी सुधि-बुधि खोकर मार्ग मे ही पड गई । रसखान कहते है कि जो बालाएँ अपने घर थी, वे प्रसन्नता-भरी लालसाओ मे मरी जाती थी । कृष्ण ने जिन बालाओ को व्याकुल किया था, वस्तुत उन्हे व्याकुल न करके प्रसन्न किया था । सवैया आजु री नन्दलला निकस्यौ तुलसीवन ते बन कै मुसकातो । देखे बनै न बनै कहतै अब सो सुख जो मुख मै न समातो ॥ हौ रसखानि बिलोकिबे कौ कुलकानि के काज कियौ हिय हातो । आइ गई अलबेली अचानक ए भटू लाज को काज कहा तो ॥१७७॥ शब्दार्थ—नन्दलला=कृष्ण । तुलसीबन=वृन्दावन । बनकै=बन-ठनकर । हातो=दूर । भटू=सखी । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज बन- ठनकर मुस्कुराता हुआ कृष्ण वृन्दावन से निकला । उसकी शोभा न तो देखते बनती थी और न कहते बनती थी और उसे देखकर जो सुख प्राप्त हुआ, उसका वर्णन नही किया जा सकता । उस आनन्द-सागर को देखने के लिए सभी ब्रज-बालाओ ने कुल की लाज और मर्यादा को अपने हृदय से दूर कर दिया । हे सखि ! इतने मे ही, अचानक वह अलबेली आ गई तो फिर लाज का क्या काम था ? अर्थात् सभी कृष्ण के प्रति पूर्णतया अनुरक्त होकर अपनी लौकिक मर्यादाओ को भूल गई ।
२६८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया अति लोक की लाज समूह मै छोरि कै राखि थकी वहु सकट सो । पल मै कुलकानि की मेड नखी नहि रोकी रुकी पल के पट सो ॥ रसखानि सु केतो उचाटि रही उचटी न सकोच की औचट सो । अलि कोटि कियौ हटकी न रही अटकी अँखियाँ लट की लट सो ॥१७८॥ शब्दार्थ—समूह मै = भीड मे ही। मेड = सीमा। नखी = लाघ दी। पल के पट सो = पलक रूपी वस्त्र मे। उचाटि = व्याकुल। औचट = ठेस, चोट। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! भीड़ मे ही अत्यधिक लोक की लाज को छोडकर मै अत्यन्त सकटमे पड़कर थक गई, क्योकि उस समय भी मैं अपने मन को काबू मे न रख सकी। कृष्ण को देखते ही क्षणभर मे ही कुल की मर्यादा की सीमा मैने लाँघ दी, अर्थात् कुल-लाज को छोड दिया। मेरी दृष्टि पलको के वस्त्र मे भी नही रुक सकी। रसखान कहते है कि मैं चाहे जितनी व्याकुल रही, पर मैं सकोच की चोट से पृथक् न हो सकी, अर्थात् सकोच किये बिना न रह सकी। हे सखि ! मैने करोड़ो प्रयत्न किये, पर स्वय को न रोक सकी और मेरी आँखे कृष्ण की लटकती हुई कु तल-राशि मे उलझ गई। रास लीला कवित्त अधर लगाइ रस प्याइ बाँसुरी बजाइ, मेरो नाम गाइ हाइ जादू कियौ मन मैं । नटखट नवल सुघर नन्दनन्दन ने, करि कै अचेत चेत हरि कै जतन मैं । झटपट उलट पुलट पट परिधान, जान लागी लालन पै सबै वाम वन मै । रस रास सरस रँगीलो रसखानि आनि, जानि जोर जुगुति विलास कियौ जन मै ॥१७६॥ शब्दार्थ—नवल = युवक। सुघर = सुन्दर। जतन मैं = यत्नपूर्वक। पट = वस्त्र। वाम = स्त्री। सरस = आनन्द देने वाला। अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला का वर्णन करती हुई कहती
व्याख्या भाग २६६ है कि जब कृष्ण ने अपनी बाँसुरी को अपने अधरो से लगाकर और उसे अधरो का रस पिलाकर तथा मेरा नाम आकर बजाया तो मेरे मन पर मानो वह जादू कर गया । नटखट युवक सुन्दर कृष्ण ने मुझे अचेत करके यत्नपूर्वक हरि के ध्यान मे लगा दिया, अर्थात् कृष्ण के ध्यान के बिना मुझे और किसी बात का पता न रहा । बाँसुरी की ध्वनि को सुनकर सारी ब्रज की स्त्रियाँ जल्दी से अपने वस्त्रो को उलटा-सीधा पहनकर वन मे पहुँच गई । तब सुन्दर रास रचने वाले सरस और रँगीले कृष्ण ने वहाँ आकर रासलीला की तथा युवतियो. का समूह एकत्र करके उनके साथ आनन्द मनाया । सवैया काछ नयो इकती बर जेउर दीठि जसोमति राज कर्यौ री । या ब्रज-मडल मे रसखान कछू तब ते रस रास पर्यौ री ॥ देखियै जीवन को फल आजु ही लाजहिं काल सिगार हौ बौरी । केते दिनानि पै जानति हौ अँखियान के भागनि स्याम नच्चोरी ॥१८६॥ शब्दार्थ—काछ = कटिवस्त्र । इकती = अद्वितीय, अनुपम ।- जेउर = जेवर- आभूषण । दीठि = ढिठौना, काजल का टीका (माताएँ अपने बच्चो को काजल का टीका इसलिए लगा देती है ताकि उन्हे किसी की नजर न लग जाये) । राज = सुन्दर । बौरी = पगली । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से रास-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि रासलील। के लिए तत्पर कृष्ण का कटि-वस्त्र अनुपम और नवीन है । वे सुन्दर आभूषण पहने हुए है । यशोदा ने उसके माथे पर सुन्दर ढिठौना लगाया हुआ है। हे पगली ! जब से इस ब्रज-मंडल मे आनन्द-सागर कृष्ण ने रासलीला करनी शुरू की है, तब से ब्रजवासियो मे नवीन जीवन का सचार हो गया है । अपने जीवन के पुण्य बल से प्राप्त इस रासलीला का आज तो देखकर आनन्द उठा ले, कल से लज्जा का श्रृंगार कर लेना; अर्थात् लज्जा को त्याग कर रासलीला को देख, क्योकि न जाने कितने दिनो के पश्चात् इन आँखो के भाग्य से कृष्ण नृत्य करेगे । विशेष—१. 'बौरी' शब्द का प्रयोग घनिष्ठ आत्मीयता का सूचक है । २. श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्था- वली' मे यह सवैया नही है ।
२७० रसखान-ग्रन्थावली सवैया आजु भटू इक गोपकुमार ने रास रच्यौ इक गोप के द्वारै । सुन्दर बानिक सौं रसखानि बन्यौ वह छोहरा भाग हमारै ॥ ए बिधना ! जो हमै हँसती अब नेकु कहूँ उतको पग धारै । ताहि वदौं फिरि आवै घरै बिनही तन औ मन जोवन वारै ॥१८१॥ शब्दार्थ—भटू=सखी। बानिक=वेश। बदौं=शर्त लगाकर कहती हूँ। वारै=न्यौछावर करके। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज एक गोप ने (कृष्ण ने) दूसरे गोप के द्वारे पर रास-लीला रचाई। हमारे सौभाग्य से वह नन्द पुत्र कृष्ण अच्छे वेश वाला बन गयः, अर्थात् उसकी छवि द्विगुणित हो गई। हे भगवान् ! जो हमारे प्रेम को लक्ष्य करके हमारे ऊपर हँसती है, अब यदि वह तनिक भी उस ओर चली जाये तो मैं शर्त लगाकर कहती हूँ कि वे अपना मन और यौवन कृष्ण पर न्यौछावर किये बिना अपने घर वापिस नही आ सकती । सवैया आज भटू मुरली-बट के तट नद के साँवरे रास रच्यौ री । नैननि सैननि वैननि सो नहि कोऊ मनोहर भाव वच्यौ री ॥ जद्यपि राखन कौ कुल कानि सबै व्रज-वालन प्रान पच्यौ री । तद्यपि वा रसखानि के हाथ विकानी की अंत लच्यौ पै लच्यौ री ॥१८२॥ शब्दार्थ—भटू—सखी। साँवरे—कृष्ण ने अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण द्वारा रचाई गई रासलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखी ! आज मुरली-वट के नीचे श्रीकृष्ण ने रासलीला रची थी। उसमे उन्होने जो प्रदर्शन किया, वह इतना विविधतापूर्ण था कि उनकी आँखो से, सैनो से तथा वचनो से कोई भी मनोहर भाव नही बचा, अर्थात् अपने आंगिक और वाचिक नृत्यो के द्वारा उन्होने सभी प्रकार के मनोहर भावो की अभिव्यक्ति कर दी थी। यद्यपि अपने वंश की मर्यादा का पालन करने के लिए सारी ब्रज-बालाओ ने प्राणपण से प्रयत्न किया, तथापि वे अंत मे अपने प्रण से झुक गई और आनन्द-सागर कृष्ण के हाथ विक गई । अर्थात् सभी ब्रज-बनिताएँ कृष्ण की छवि पर मुग्ध हो गई ।
व्याख्या भाग २७१ सवैया कीजै कहा जु पै लोग चवाव सदा करिवौ करि है वजमारौ । सीत न रोकत राखत कागु सुगावत ताहिरी गावन हारौ । आव री सीरी करै अँखिया रसखान धनै धन भाग हमारी । आवत हे फिरि आज बन्यौ वह राति के रास को नाचन हारौ ॥१८३॥ शब्दार्थ—चवाव = निन्दा । वजमारौ = अत्यन्त घातक । सीत न रोकत राखत कागु = कौआ शीतकाल (शरद् ऋतु) का आगमन नही रोक सकता । (शरद् आगमन के साथ ही श्राद्ध-समय समाप्त हो जाता है । अत कौवा नही चाहता कि शरद् ऋतु आवे, पर उसे रोकना उस बेचारे के बस की बात नही है । सीरी करै = शीतल करे, आनन्द प्राप्त करे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला मे सम्मिलित होने का आग्रह करती हुई कहती है कि हे सखि ! यदि लोग हमारी अत्यन्त घातक निन्दा सदा करते रहते है, तो करे, हमे इससे चिन्तित नही होना चाहिए, क्योकि कौआ चाहे जितनी काँव-काँव करे, पर वह शरद् ऋतु के आगमन को नही रोक सकता । अत. चलो, रासलीला मे सम्मिलित होकर हम अपनी आँखे शीतल करे, आनन्द प्राप्त करे । हमारा भाग्य धन्य है जो हमे इस प्रकार की रासलीला को देखने का अवसर प्राप्त हुआ है। कल रात को रासलीला मे नृत्य करने वाला वह कृष्ण आज फिर बन-ठनकर रासलीला मे सम्मिलित हो रहा है । विशेष—१ लोकोक्ति का सुन्दर प्रयोग है । २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसादमिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रंथावली' मे नही है । सवैया सासु अच्छै वरज्यौ विटिया जु बिलोके अतीक लजावत है । मोहि कहै जु कहूँ वह बात कही यह कौन कहावत है । चाहत काहू के मूंड चढ़यौ रसखान झुकै झुकि आवत है । जब तै वह ग्वाल गली मे नच्यौ तब तै वह नाच नचावत है ॥१८४॥ शब्दार्थ—अच्छै वरज्यौ = अच्छी प्रकार रोकी । विटिया = पुत्रवधू । मूंड चढ़यौ = सिर पर चढ गया, धृष्ट हो गया । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला का वर्णन करती हुई कहती
२७२ रसखान-ग्रन्थावली है कि यद्यपि अपनी पुत्रवधू को उसकी सास ने रासलीला मे आने से अच्छी प्रकार रोक दिया, तथापि वह न रुक सकी । अपनी आज्ञा का उल्लघन देखकर सास बहुत लज्जित हो रही है । यदि मुझसे वह यह बात कहती तो मैं तुरन्त उत्तर दे देती कि यह कहाँ की बात है । आनन्द-सागर कृष्ण इतने धृष्ट हो गये हैं कि वे किसी गोपी को अपने वश मे करना चाहते है, तभी तो वे बार- बार उसकी ओर झुकझुककर आते है । जब से कृष्ण ने उस गली मे रासलीला की है, तब से उसने सभी गोपियो को पूर्णतया अपने वश मे कर लिया है । विशेष— १. मुहावरो का सुन्दर प्रयोग । २ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया देखत सेज बिछी री अच्छी सु विछी विप सो भिदिगौ सिगरे तन । ऐसी अचेत गिरी नहि चेत उपाय करे सिगरी सजनी जन । बोली सयानी सखी रसखानि वचै यौ सुनाइ कह्यो जुवती गान । देखन कौ चलियै री चलौ सब रास रच्यौ मनमोहन जू वन ॥१८४ ॥ शब्दार्थ—अच्छी = अच्छी । भिदिगौ = दौड गया । सयानी = चतुर । अर्थ—रासलीला के प्रभाव से एक गोपी इतनी भाव-विभोर हो गई कि उसे अपनी सुधि ही न रही । उसी की अवस्था का वर्णन एक गोपी अपनी सखी से कर रही है कि एक गोपी अपनी अच्छी सेज को बिछी देखकर उस पर सोना चाहती थी कि इतने मे बाँसुरी की ध्वनि सुनाई दी । उसे सुनकर उसके सारे शरीर मे विष-सा फैल गया । वह ऐसी अचेत होकर गिरी कि उसकी सारी सखियो ने अनेक उपाय किये, पर उसे चेत नही हुआ । तब एक चतुर गोपी ने अपनी सखियो को बताया कि इसकी अचेतना तभी हट सकती है जब इसको सुनाकर यह कहा जाये कि हे सखि ! कृष्ण ने वन मे रास रचा है, अत सब उसे देखने के लिए चलो । तुलना— १ 'दुसह विरह दारुन दसा, रहै न और उपाय । जात जात ज्यो राखियतु, पिय को नाम सुनाय ॥ —बिहारी २. 'मोहि घरीक जिवायौ चहै तो । कहै किन वाही बिसासी की बाते ।' —किशोर
व्याख्या भाग २७३ फाग-लीला सवैया खेलतु फाग लख्यौ पिय प्यारी को ता सुख की उपमा किहि दीजै । देखत ही बनि आवै भलै रसखान कहा है जो वारि न कीजै ॥ ज्यौ ज्यौ छवीली कहै पिचकारी लै एक लई यह दूसरी लीजै । त्यौ त्यौ छवीलो छकै छवि छाक सो हेरै हँसे न टरै खरौ भीजै ॥१८६॥ शब्दार्थ—किहि = किस प्रकार । वारि = न्यौछावर करना । छकै छवि छाक सो = रूप के नशे मे मस्त होते है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से फागलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैने कृष्ण और उनकी प्यारी राधा को फाग खेलते हुए देखा । उस समय की जो शोभा थी, उसकी किस प्रकार उपमा दी जा सकती है । उस समय की शोभा तो देखते ही बनती है और कोई भी ऐसी वस्तु नही है जो उस शोभा पर न्यौछावर न की जा सके । ज्यो-ज्यो वह सुन्दरी राधा चुनौती देकर एक के बाद दूसरी पिचकारी कृष्ण के ऊपर चलाती है, त्यो-त्यो वे रूप के नशे मे मस्त होते जाते है । राधा की पिचकारी को देखकर वे हँसते तो है, पर वे वहाँ से भागे नही और खडे-खड़े भीगते रहे । विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया खेलत फाग सुहागभरी अनुरागहिं लालन कौ भरि कै । मारत कुकुम केसरि के पिचकारिन मै रग को भरि कै ॥ गेरत लाल गुलाल लली मन मोहिनि मौज मिटा करि कै । जात चली रसखानि अली मदमत्त मनी-मन को हरि कै ॥१८७॥ शब्दार्थ—अनुरागहिं = प्रेम को । मनी-मन = मन रूपी मणि । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! सौभाग्यवती ब्रजवालाएँ कृष्ण के प्रेम को हृदय मे धारण करके फाग (होली) खेल रही है । वे कु कुम और केसर को तथा रंग भरी पिचकारी को कृष्ण के ऊपर छोड रही है । ब्रजवालाएँ, जो मन को मोहने वाली हैं, अपने सुख को भुलाकर कृष्ण के ऊपर लाल गुलाल डाल रही हैं। हे सखि !
२७४ रसखान-ग्रन्थावली वह ब्रजवाला मदमस्त मन रूपी मन का हरण करके चली जा रही है। पाठांतर—इस सवैया की अंतिम पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'जात चली रसखान अली मदमत्त मनी मन को हरि कै।' सवैया फागुन लाग्यो जब ते तब ते ब्रजमंडल धूम मच्यौ है। नारि नवेली बचै नहि एक विसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है। साँझ सकारे वही रसखानि सुरंग गुलाल लै खेल रच्यौ है। को सजनी निलजी न भई अब कौन भटू जिहिं मान वच्यौ है॥१८६॥ शब्दार्थ—नवेली=नई, युवती। अच्यो=पीना। सुरंग= सुन्दर रंग, लाल। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से होली का वर्णन करती हुई करती है कि हे सखि ! जबसे फागुन का महीना लगा है, तबसे सारे ब्रज-मंडल मे धूम मची हुई है। कोई भी युवती नारी इस धूमधाम से नही बची है और सबा ने एक विशेष प्रकार का प्रेम पी लिया है। प्रातः और साय आनंद-सागर कृष्ण लाल गुलाल लेकर फाग का खेल खेलते रहते हैं। हे सजनी ! इस फागुन के महीने मे कौन ऐसी ब्रजवाला है जो निर्लज्ज नही बन गई है ? तथा जिसका मान बचा रह गया है ? विशेष—अंतिम पंक्ति मे काकुवक्रोक्ति अलंकार। कवित्त आई खेलि होरी ब्रजगोरी वा किसोरी सग, अंग अंग इगनि अनग सरसाइ गौ। कुंकुम की मार वा पै रंगनि उद्धार उडै, बुक्का औ गुलाल लाल लाल बरसाइगौ। छोडै पिचकारिन धमारिन विगोइ छोडै, तोडै हिय-हार धार रंग बरसाइ गौ। रसिक सलोनो रिझवार रसखानि आजु, फागुन मै औगुन अनेक दरसाई गौ ॥१८६॥ शब्दार्थ—अनग=कामदेव। तरसाइ गौ= ललचा गया। धपारिन= होली-गीत । सलोनो=सुन्दर। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की होली का वर्णन करती हुई
व्याख्या भाग २७५ कहती है कि आज कृष्ण ने ब्रज की गोरियो और राधा के साथ ऐसी होली खेली कि उनके अंग-अंग को रग कर कामभावना उत्पन्न कर दी। कु कुम की मार से और उसके ऊपर अनेक प्रकार के रगो को डालकर लाल गुलाल की मुट्ठियाँ विखेरकर वह कृष्ण सबको ललचा गया। उसने पिचकारियाँ छोडी, होली के गीत गाये तथा गोपियो के हृदय के हारो को तोडकर वह रग की धारा बरसा गया। रसखान कहते है कि वह रसिक और सुन्दर कृष्ण आज फागुन मे होली खेलते समय अपने अनेक अवगुणो को प्रकट कर गया। कवित्त गोकुल को ग्वल काल्हि चौमुँह की ग्वालिन सो, चाचर रचाइ एक धूमहि मचाइ गौ । हियो हुलसाइ रसखानि तान गाइ वाँकी, सहज सुभाइ सब गाँव ललचाइ गौ । पिचका चलाइ और जुवती भिजाइ नेह, लोचन नचाइ मेरे अगहि नचाइ गौ । सासहि नचाइ भोरी नदहि नचाइ खोरी, बैरनि सचाइ गोरी मोहि सकुचाइ गौ ॥१६०॥ शब्दार्थ-काल्हि = कल। चौमुँह = चारो ओर की। पिचका = पिच- कारी। भिजाइ नेह = प्रेम मे भिगोकर। खोरी = गली। बैरनि सचाइ = बैरो का बदला लेकर। सकुचाइ गौ = लज्जित कर गया। अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कल गोकुल का एक ग्वाला (कृष्ण) चारो ओर की गोपियो को घेरकर, चाँचर रचाकर धूम मचा गया। रसखान कहते है कि वह वाँकी बाँसुरी की तान सुनाकर तथा हृदय को उल्लसित करके सहज स्वभाव से सब गाँव वालो को ललचा गया है। वह अपनी पिचकारी चलाकर तथा समस्त युवतियो को प्रेम से भिगोकर और अपनी आँखो को नचाकर मेरे सारे अगो को नचा गया है। वह हमारी ही गली मे मेरी सासु को तथा भोली ननद को नचाकर और पुराने बैरों का बदला लेकर मुझे लज्जित कर गया।
२७६ रसखान-ग्रन्थावली सवैया आवत लाल गुलाल लिये मग सूने मिली इक नार नवीली। त्यों रसखानि लगाइ हिये भटू मौज कियो मन माहि अधीनी। सारी फटी सुकुमारी हटी अंगिया दर की सरकी रगभीनी। गाल गुलाल लगाइ लगाइ कै अंक रिझाड विदा करि दीनी ॥१६१॥ शब्दार्थ—लाल=कृष्ण। सारी=साडी। अंक=हृदय। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण हाथ मे गुलाल लिये हुए आ रहे थे कि सूने मार्ग मे उन्हे एक युवती नारी मिली। उसे उन्होने अपने हृदय से लगाकर आनन्द के साथ अपनी मनचाही की। उसकी साडी फट गई, सौकुमार्य नष्ट हो गया, चोली फट गई और अपने स्थान से हट गई। कृष्ण ने उसके कपोलो पर गुलाल लगाकर, उसके हृदय से लगाकर तथा रिझाकर विदा कर दिया। सवैया लीने अबीर भरे पिचका रसखानि खारो बहु भाय भरौ जू। मार से गोपकुमार कुमार से देखत ध्यान टरौ न टरौ जू॥ पूरव पुन्यनि हाथ पर्यौ तुम राज करौ उठि काज करौ जू। ताहि सरौ लखि लाज जरौ इहि पाख पतिव्रत ताख धरौ जू ॥१६२॥ शब्दार्थ—पिचका=पिचकारी। भाय=भाव मार=कामदेव। कुमार =थोडी अवस्था के। सरौ=समक्ष, सम्मुख। पाख=पक्ष। ताख=आला। ताख धरौ=छोड दिया। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह आनद सागर कृष्ण अनेक प्रकार के भावो मे भरकर तथा अबीर भरी पिचकारी लेकर खडा हुआ था। छोटी अवस्था के गोपकुमार कामदेव जैसे दिखाई दे रहे थे जिन्हे देखते देखते ध्यान उन पर टारे से भी नही टरता था। वह तुम्हारे हाथ पूर्व जन्म के पुण्यो के कारण ही लग गया है, अत' तुम उठकर अपना काम करो और उस पर शासन करो उसको सामने देखकर लज्जा को छोडो तथा। इस पक्ष मे पतित-धर्म का त्याग कर दो। विशेष—१ द्वितीय पंक्ति मे उपमा अलकार।
व्याख्या भाग २७७ २. चतुर्थ पंक्ति मे मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग । तुलना—हम भापत है हरिचन्द पिया अहो लाडिलि देर न मामै करो । चलो फूलौ भूलाओ झुकौ उझकौ इहिं पाख पतिव्रत ताख धरौ ॥ सवैया मिलि खेलत फाग बढ्यौ अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै । कर कुंकुम लै करि कजमुखी प्रिय के दृग लावन कौ धमकै ॥ रसखानि गुलाल की धूंधर मै ब्रजवालन की दुति यों दमकै । मनौ सावन माँझ ललाई के माँझ चहूँ दिसि ते चपला चमकै ॥१६३॥ शब्दार्थ—अनुराग = प्रेम । रमकै = अठखेलियाँ । कजमुखी = कमल जैसे सुन्दर मुख वाली । लावन कौ = फेंकने के लिए । धूंघर = धुंधार । चपला = बिजली । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण गोपियो के साथ फाग खेल रहे थे । सुख की इन सौभाग्यशाली अठखेलियो मे उनका प्रेम बढ़ गया था । कमल जैसे सुन्दर मुख वाली गोपियाँ हाथ मे कुंकुम लेकर उसे उनके ऊपर फेकने के लिए अवसर ताक रही थी । रसखान कहते है कि गुलाल की धुँआधार मे ब्रजबालाओ की द्युति इस प्रकार चमक रही थी, मानो सावन मास की लालिमा मे चारो ओर से बिजली चमक रही हो । विशेष—अंतिम पंक्ति मे उत्प्रेक्षा अलंकार । राधा का सौन्दर्य कवित्त आजु बरसाने बरसाने सब आनन्द सो, लाडिली बरस गाँठि आई छवि छाई है । कौतुक अपार घर घर रग विसतार, रहत निहारि सुध बुध विसराई हैं । आये ब्रजराज ब्रजरानी दधि दानी सग, अति ही उमगे रूप रासि लूटि पाई है । गुनी जन गान घन दान सनमान, वाजे— पौरनि निसान रसखान मन भाई है ॥१६४॥ शब्दार्थ—बरसाने = वर्षा ऋतु मे । बरसाने = ब्रज का एक गाँव, राधा
२७८ रसखान-ग्रन्थावली इसी गाँव की रहने वाली थी। रंग विसतार = आनंद का प्रसार। निसान = नगाडा । अर्थ - राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखी ! आज वर्षा ऋतु मे बरसाने गाँव के सभी निवासी प्रसन्न हैं, क्यो आज प्यारी राधा की वर्षगाँठ है, इसीलिए चारो ओर शोभा छाई हुई है। हर स्थान पर अपार आश्चर्य और आनन्द का प्रसार है जिसे देखकर लोग अपनी सुधि-बुधि भूल जाते है। दही वा दान लेने वाले कृष्ण राधा के साथ यहाँ आये है। वे अत्यन्त प्रसन्न है, क्योकि उन्हे रूप-राशि राधा को लूटने का अवसर मिला है। गाँव मे हर स्थान पर गुणी व्यक्ति गीत गाते हुए सम्मानपूर्वक धन का दान कर रहे है और सर्वत्र मनोहर नागडे बज रहे है विशेष—यह कवित्त श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली मे नही है । कवित्त कैधो रसखान रस कोस दृग प्यास जानि, आनि कै पियूप पूप कीनो विधि चद घर कैधो मनि मानिक बैठारिवै को कंचन मैं, जरिया जोवन जिन गढिया सुघर घर । कैधो काम कामना के राजत अधर चिन्ह, कैधों यह भौर जान वोहित गुमान हर । एरी मेरी प्यारी दुति कोटि रति रम्भा की, वारि डारो तेही चित चोरनि चिबुक पर ॥१६५॥ शब्दार्थ—रस कोस—आनन्द-निधि । पियूप पूप = अमृत का सार । विधि = ब्रह्म। गढिया सुघर घर = सुन्दर घर बना लिया। वोहित = नौका । गुमान हर = गर्व को नष्ट करने वाला। दुति = शोभा । अर्थ—कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि ब्रह्मा ने ससार को प्यासा जानकर उसकी तृप्ति के लिए तुम्हारे नेत्रो मे आनन्द-निधि भर दिया है। तुम्हारा मुख इतना सुन्दर है जैसे अपने अमृत-सार को सजोकर स्वय चन्द्रमा उपस्थित हो गया हो । तुम्हारे शरीर का गठन ऐसा है जैसे सोने मे मणि-मुक्ताओ को जडने के लिए कुशल जडिया यौवन ने
व्याख्या भाग २७६ सुन्दर घर (रत्न जड़ने के लिए) स्थान बना दिया हो । तुम्हारे अधरो की लाली काम कामना जैसी सुशोभित है । तुम्हारी नासिका का छिद्र उस भौंरे के समान है जिसमे ज्ञान की नौका का गर्व नष्ट हो जाता है, अर्थात् सुधि-बुधि नष्ट हो जाती है । मेरी प्यारी सखी राधा ! तेरी मनोहर चिबुक पर मै करोडो रति और रम्भा की शोभा को न्यौछावर करती हूँ। विशेष —यह कवित्त श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया श्री मुख यौ न बखान सकै वृषभान सुता जू को रूप उजारो । हे रसखान तू ज्ञान सभार तरैनि निहार जु रीझन हारो । चारु सिंदूर को लाल रसाल लसै ब्रज बाल को भाल टिकारो । गोद मे मानौ विराजत है घनस्याम के सारे को सारे को सारो ॥१६६॥ शब्दार्थ—श्रीमुख=मुख की शोभा । वृषभान सुता=राधा । तरैनि= नक्षत्र । रसाल=सरस । टिकारो=टीका । घनस्याम के सारे की सारे को सारो=मगल । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! राधा के मुख की शोभा का कौन वर्णन कर सकता है। उसका सौन्दर्य प्रकाशित करने वाला है। रसखान कहते है कि हे मनुष्य ! तू अपना ज्ञान सभाल और यदि तू राधा के रूप का कुछ बोध करना चाहता है तो नक्षत्रो की ओर देख, अर्थात् जिस प्रकार नक्षत्रों की प्रभा अनुपम है, उसी प्रकार राधा का रूप भी अद्वितीय है । उस ब्रजबाला के मस्तक पर लगा हुआ सिन्दूर का टीका अत्यन्त सुन्दर एवं सरस है । वह टीका ऐसा प्रतीत होता है मानो चन्द्रमा की गोद मे मंगल सुशोभित हो । विशेष—१. उत्प्रेक्षा अलकार । २ 'घनस्याम के सारे की सारे को सारो' मे क्लिष्टत्व दोष है क्योकि इसका अर्थ क्लिष्टता से निकलता है—घनस्याम का साला= चन्द्रमा; चन्द्रमा की स्त्री=बीरबहूटी; बीरबहूटी का भाई मगल । ३ यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रंथावली' मे नही है ।
२८० रसखान-ग्रन्थावली सवैया अति लाल गुलाल दुकूल ते फूल अली । अलि कुंतल राजत है। मखतूल समान के गुज छरानि मैं किसुक की छवि छाजत है ॥ मुकता के कदव ते अव के मौर सुने सुर कोकिल लाजत है। यह आवनि प्यारी जु की रसखानि वसत-सी आज विराजत है ॥१६७॥ शब्दार्थ-अली=सखी । अलि=भ्रमर । कुंतल=केश । मखतूल= काला रेशम । छरानि मैं=डोरियो मे । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! उसका अत्यन्त लाल गुलाल के समान दुकूल गुलाब के लाल फूल की भाँति शोभायमान है । उसकी काली केशराशि भोरो के समान सुशोभित है । काले रेशम की डोरियो मे बँधे हुए गुज पलाश-पुष्प की भाँति शोभा सम्पन्न है । उसके मोती कदव और आम की मजरियो के समान शोभायमान है । उसकी वाणी मे इतना माधुर्य है कि उसके वचनों को सुनकर कोयल भी लजा जानी है । इस अपनी प्यारी और आनन्द की खान राधा की शोभा वसन्त श्री के समान प्रतीत हो रही है । विशेष-यमक, उपमा, छेकानुप्रास और साग रूपक अलंकार । सवैया तन चन्दन खौर कै बैठी भटू रही आजु सुधा की सुता मनसी । मनौ इन्दुवधून लजावन को सब जानिन काढि घरी गन सी ॥ रसखानि विराजति चौकी कुचौ बिच उत्तमताहि जरी तन सी । दमकै दृग वान के घायन को गिरि सेत के संधि के जीवन सी ॥१६८॥ शब्दार्थ-सुधा की सुता मनसी=सुधा की मानस-पुत्री । इदुववून= चन्द्रमा की पत्नियो तारिकाओ को । लजावन=लज्जित करने के लिए । गन सी=गणश्री, अपने समूह की सात्विक छटा । चौकी=हार के बीच का चदा । उत्तमताहि=सौन्दर्य को । संधि=बीच । जीवन-सी=जलाशय की भाँति । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से राधा की सुन्दरता का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! अपने शरीर पर चन्दन लगाकर बैठी हुई वह सुधा की मानस पुत्री राधा ऐसी प्रतीत हो रही है, मानो चन्द्रमा की पत्नियों
व्याख्या भाग . २८१ तारिकाओं को लज्जित करने के लिए सब प्रकार से अपनी समग्र सात्विक शोभा को बाहर निकाल कर बैठी हुई हो। रसखान कवि कहते हैं कि उसके कुचों के बीच में हार का चंदा इस प्रकार शोभा दे रहा है, जैसे सौन्दर्य को ही उसके शरीर मे जड दिया गया हो। वह चन्दा ऐसा प्रतीत होता है मानो दृग बाणो का घाव दमक रहा हो, अथवा श्वेत पर्वत के संधिस्थान में कोई जलाशय हो। विशेष-१. उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति अर्थालंकारो का बडा ही भावपूर्ण प्रयोग हुआ है। २ 'दमकै दृग बान के घायन को' मे दी गई उपमा रसानुभूति मे बाधक है। सवैया आज सँवारति नेकु भटू तन, मद करी रति की दुति लाजै । देखत रीझि रहे रसखानि सु और छटा विधिना उपराजै ॥ आए है न्यौते तरैमन के मनो सग पतंग पतग जु राजै । ऐसे लसै मुकुतागन मै तित तेरे तरौना के तीर बिराजै ॥१६६॥ शब्दार्थ-भटू = सखी। रति = कामदेव की स्त्री, जो सर्वाधिक सुन्दर मानी जाती है। दुति = द्युति, शोभा। लाजै = लज्जित हो जाती है। रसखानि = आनन्द सागर कृष्ण। विधिना = ब्रह्मा। उपराजै = उत्पन्न करे। तरैमन के = नक्षत्रो के, मोतियो के। पतग = सूर्य, तरौना। पतग = शलभ, तिल। तीर = किनारा। अर्थ- कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज तनिक अपना शरीर संभाल लो, क्योकि इसके सौन्दर्य के समक्ष रति का सौन्दर्य भी मन्द हो गया है और वह इसी कारण लज्जित हो रही है। आनन्द सागर कृष्ण तुम्हारी शोभा को देखकर रीझ रहे है। तुम्हारे अतिरिक्त ब्रह्मा और क्या उत्पन्न करे ? अर्थात् तुम उसकी सौन्दर्य सृष्टि की चरम पराकाष्ठा हो। मोतियो से युक्त तुम्हारे तरौना के किनारे पर सुशोभित होता हुआ तिल इस प्रकार सुशोभित हो रहा है मानो सूर्य के साथ सारे नक्षत्र आकर एकत्र हो गए हो। विशेष-प्रतीप, श्लेप, यमक, उपमा अलंकार।
२८२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया प्यारी की चारु सिंगार तरगनि जाय लगि रति की दुति कूलनि । जोवन जेब कहा कहियै उर पै छवि मजु अनेक दुकूलनि । कंचुकी सेत मै जावक विन्दु विलोकि मरै मघवानि की सूलनि । पूजे है आजु मनौ रसखान सु भूत के भूप वधूक के फूलनि ॥२००॥ शब्दार्थ - सिगार तरगन=सौन्दर्य की लहरे । जेब=कान्ति । सेत= श्वेत, सफेद । जावक=महावर, लाल रग । मघवानि की सूलनि=इन्द्र वज्र की चोट । भूत के भूप=शिव । वधूक के फूलनि=दुपहरिया के लाल रग के फूलो से । अर्थ-कोई गोपी राधा के सौन्दर्य का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि हे मखि ! उस प्यारी राधा के सुन्दर सौन्दर्य की लहरे रति की शोभा के किनारो से जा लगी है, अर्थात् वह रति के समान सुन्दर है । उसके यौवन की काति का तो कहना ही क्या ? उसके हृदय पर अनेक सुन्दर वस्त्रों की शोभा सुशोभित है । उसकी श्वेत कचुकी मे लाल रग के विन्दु को देखकर तो मनुष्य इन्द्र के वज्र की चोट की भाँति भारी चोट खाकर मर जाता है । उसके कुचो पर पडा हुआ लाल वस्त्र इस प्रकार प्रतीत हो रहा है। मानो बन्धूक के फूलो से शिव की पूजा की गई हो । विशेष-१ उत्प्रेक्षा अलकार । २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रथावली' मे नही है । तुलना—'दुरत न कुच बिच कचुकी, चुपरी सादी सेत । कवि अंकन के अर्थ लौ, प्रगट दिखाई देत ।।' —बिहारी सवैया बाँकी मरोर गटी भृकुटीन लगी अखियाँ तिरछानि तिया की । टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिनि ते दुति दूनी हिमा की ॥ सोहै तरग अनग की अंगनि ओप उरोज उठी छतिया की । जोवन जोति सु यौ दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ॥२०१॥ शब्दार्थ-टाक=पतली । लाक=लक, कमर । सुदामिनि=सौदामिनी,