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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग . २८१ तारिकाओं को लज्जित करने के लिए सब प्रकार से अपनी समग्र सात्विक शोभा को बाहर निकाल कर बैठी हुई हो। रसखान कवि कहते हैं कि उसके कुचों के बीच में हार का चंदा इस प्रकार शोभा दे रहा है, जैसे सौन्दर्य को ही उसके शरीर मे जड दिया गया हो। वह चन्दा ऐसा प्रतीत होता है मानो दृग बाणो का घाव दमक रहा हो, अथवा श्वेत पर्वत के संधिस्थान में कोई जलाशय हो। विशेष-१. उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति अर्थालंकारो का बडा ही भावपूर्ण प्रयोग हुआ है। २ 'दमकै दृग बान के घायन को' मे दी गई उपमा रसानुभूति मे बाधक है। सवैया आज सँवारति नेकु भटू तन, मद करी रति की दुति लाजै । देखत रीझि रहे रसखानि सु और छटा विधिना उपराजै ॥ आए है न्यौते तरैमन के मनो सग पतंग पतग जु राजै । ऐसे लसै मुकुतागन मै तित तेरे तरौना के तीर बिराजै ॥१६६॥ शब्दार्थ-भटू = सखी। रति = कामदेव की स्त्री, जो सर्वाधिक सुन्दर मानी जाती है। दुति = द्युति, शोभा। लाजै = लज्जित हो जाती है। रसखानि = आनन्द सागर कृष्ण। विधिना = ब्रह्मा। उपराजै = उत्पन्न करे। तरैमन के = नक्षत्रो के, मोतियो के। पतग = सूर्य, तरौना। पतग = शलभ, तिल। तीर = किनारा। अर्थ- कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज तनिक अपना शरीर संभाल लो, क्योकि इसके सौन्दर्य के समक्ष रति का सौन्दर्य भी मन्द हो गया है और वह इसी कारण लज्जित हो रही है। आनन्द सागर कृष्ण तुम्हारी शोभा को देखकर रीझ रहे है। तुम्हारे अतिरिक्त ब्रह्मा और क्या उत्पन्न करे ? अर्थात् तुम उसकी सौन्दर्य सृष्टि की चरम पराकाष्ठा हो। मोतियो से युक्त तुम्हारे तरौना के किनारे पर सुशोभित होता हुआ तिल इस प्रकार सुशोभित हो रहा है मानो सूर्य के साथ सारे नक्षत्र आकर एकत्र हो गए हो। विशेष-प्रतीप, श्लेप, यमक, उपमा अलंकार।