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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२८२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया प्यारी की चारु सिंगार तरगनि जाय लगि रति की दुति कूलनि । जोवन जेब कहा कहियै उर पै छवि मजु अनेक दुकूलनि । कंचुकी सेत मै जावक विन्दु विलोकि मरै मघवानि की सूलनि । पूजे है आजु मनौ रसखान सु भूत के भूप वधूक के फूलनि ॥२००॥ शब्दार्थ - सिगार तरगन=सौन्दर्य की लहरे । जेब=कान्ति । सेत= श्वेत, सफेद । जावक=महावर, लाल रग । मघवानि की सूलनि=इन्द्र वज्र की चोट । भूत के भूप=शिव । वधूक के फूलनि=दुपहरिया के लाल रग के फूलो से । अर्थ-कोई गोपी राधा के सौन्दर्य का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि हे मखि ! उस प्यारी राधा के सुन्दर सौन्दर्य की लहरे रति की शोभा के किनारो से जा लगी है, अर्थात् वह रति के समान सुन्दर है । उसके यौवन की काति का तो कहना ही क्या ? उसके हृदय पर अनेक सुन्दर वस्त्रों की शोभा सुशोभित है । उसकी श्वेत कचुकी मे लाल रग के विन्दु को देखकर तो मनुष्य इन्द्र के वज्र की चोट की भाँति भारी चोट खाकर मर जाता है । उसके कुचो पर पडा हुआ लाल वस्त्र इस प्रकार प्रतीत हो रहा है। मानो बन्धूक के फूलो से शिव की पूजा की गई हो । विशेष-१ उत्प्रेक्षा अलकार । २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रथावली' मे नही है । तुलना—'दुरत न कुच बिच कचुकी, चुपरी सादी सेत । कवि अंकन के अर्थ लौ, प्रगट दिखाई देत ।।' —बिहारी सवैया बाँकी मरोर गटी भृकुटीन लगी अखियाँ तिरछानि तिया की । टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिनि ते दुति दूनी हिमा की ॥ सोहै तरग अनग की अंगनि ओप उरोज उठी छतिया की । जोवन जोति सु यौ दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ॥२०१॥ शब्दार्थ-टाक=पतली । लाक=लक, कमर । सुदामिनि=सौदामिनी,