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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २८३. विजली । दुति छुति, शोभा । अनग = कामदेव । ओप = शोभा । उरोज = स्तन । अर्थ—कोई गोपी राधा की वय सन्धि का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि राधा की तिरछी आंखो ने, जो भृकुटी तक फैली हुई है, गर्वीली वक्रता ग्रहण कर ली है । आनन्द सागर राधा की कमर पतली हो गई है । उसके हृदय की (शीरर की) शोभा दामिनी से भी अधिक बढ़ गई है । उसके अगो मे कामदेव की तरगे शोभायमान है, उसकी छाती के उठे हुए स्तन भी शोभायुक्त है । उसकी यौवन शोभा इस प्रकार दमक रही है, मानो दीपक की बाती उकसा दी गई हो; अर्थात् जिस प्रकार दीपक की बाती को बढाने से धूमिल प्रकाश स्पष्ट हो जाता है, उसी प्रकार राधा के अगो मे भी यौवन की शोभा स्पष्ट दिखाई दे रही है । विशेष—उपमा, अधिक, छेकानुप्रास अलंकार । तुलना—१ 'अंग अंग नग जगमगै, दीप सिखा सी देह । दिया बढाये हू रहै, बडो उजेरो गेह ॥ —बिहारी २. 'पलट चली मुसकाय, दुति रहीम उपजाय अति । बाती सी उकसाय, मानो दीनी देह की ।' —रहीम सवैया वासर तूँ जु कहूँ निकरै रवि को रथ माँझ अकास अरै री । रैन यहै गति है रसखानि छपाकर आँगन ते न टरै री ॥ द्यौस निस्वास चल्यौई करै निसि द्यौस की आसन पाय घरै री । तेरो न जात कछू दिन राति विचारे बटोही की बाट परै री ॥२०२॥ शब्दार्थ—वासर = दिन । छपाकर = चन्द्रमा । द्यौस = दिवस, दिन । बाह परै = रास्ता रुक जाता है । अर्थ—कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे राधा ! यदि तू दिन मे अपने घर से बाहर निकल आती है तो तेरे सौन्दर्य से सूर्य इतना चकित हो जाता है कि उसका रथ आकाश मे ही रुक जाता है, अर्थात् सूर्य अपनी गति भूलकर एकटक तुझे ही देखता रह जाता