रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 301, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें२८४ रसखान-ग्रन्थावली
है । हे आनन्द-सागर राधा ! रात को भी यही दशा होती है । तेरा सौन्दर्य देखकर चन्द्रमा तेरे आँगन मे ही ठहर जाता है और आगे नही बढता । दिन मे तो पवन चलता ही रहता है, पर रात मे भी वह दिन की आशा से तेरे पीछे लगा रहता है, अर्थात् तेरी सुगन्धि का लोभी पवन रात-दिन चलता रहता है । इस पवन के रात-दिन चलते रहने के कारण तेरा तो कुछ नही बिगडता, पर बेचारे पथिक का रास्ता रुक जाता है, अर्थात् वह अपने रास्ते पर चल नही पाता । विशेष—अत्युक्ति और व्याजस्तुति अलंकार । तुलना—'मेरे कहे हाहा करि नीरे ह्वै निहारी जब, जेते वट वाट के बटाऊ मारे जात हैं ।' —आलम सवैया जाको लसै मुख चन्द समान कमानी सी भौह गुमान हरै। दीरघ नैन सरोजहुँ तै मृग खंजन मीन की पाँत दरै ॥ रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै । जिहिं नीके नवै कटि हार के भार सो तासो कहै सब काम करै ॥२०३॥ शब्दार्थ—गुमान हरै=गर्व को नष्ट करती है । सरोज=कमल । दरै= चूर्ण करना । उरोज=स्तन । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जिसका मुख चन्द्रमा के समान सुशोभित है । कमानी सी भौंहे गर्व को नष्ट करती है, विशाल हैं नेत्र कमल से बढकर हैं और मृग, खंजन तथा मीन की पंक्तियों को चूर्ण करने वाले है । आनन्द-सागर स्तनो को देखते ही ऐसा कौन ऋषि है जो अपनी समाधि से विचलित नही हो जाता । जो कटि के हार के बोझ से ही, अपनी सुकुमारता के कारण, नीचे झुक जाती है, उससे सब काम करने को कहते है । विशेष—१. उपमा, व्यतिरेक, वक्रोक्ति, अतिशयोक्ति अलंकार । २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' में नही है । पाठान्तर—इस सवैये की प्रथम दो पंक्तियों का यह रूप भी मिलता है ।