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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २८५ 'यह जाको लसै मुख चन्द-समान कमान-सी भौंह गुमान हरैै। अतिदीरघ नैन सरोजहूँ ते मृग खंजन मीन की पाँति दरै ॥' सवैया प्रेम कथानि की बात चलै चमकै चित चंचलता चिनगारी । लोचन वक विलोकनि लोलनि बोलनि मै बतियाँ रसकारी ॥ सोहै तरंग अनंग को अगनि कोमल यौ झमकै झनकारी । पूतरी खेलत ही पटकी रसखानि सु चौपर खेलत प्यारी ॥२०४॥ शब्दार्थ-लोलनि = सुन्दर, मधुर । रसकारी = आनन्ददायक । अनंग = कामदेव । झमकै = ध्वनि करती है । पूतरी = चौसर की गोट । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से चौपड का वर्णन करती हुई कह रही है कि जब भी प्रेम-कथाओ की चर्चा चलती है तो कृष्ण के मन मे चंचलता की चिनगारी चमकने लगती है । वे वक्र दृष्टि से देखने लगते है, मधुर बोल बोलने लगते है और उनकी बाते अत्यधिक आनन्द से भरी हुई होती है । उनके अंगो मे कामदेव की लहरे सुशोभित हो जाती है । रसखान कहते हैं कि उन्होने अपनी प्राणप्रिया के साथ चौपड खेलते हुए अपनी गोट को पटक दिया, अर्थात् वे अपनी प्रिया के प्रेम मे इतने तल्लीन हुए कि चौपड़ खेलना ही भूल गये । विशेष-अनुप्रास अलकार । मानवती राधा सवैया वारति जा पर ज्यौ न थकै चहुँ ओर जिती नृपती घरती है । मान सकै घरती सो कहाँ जिहि रूप लखै रति सी रती है । जा रसखान बिलोकन काज सदाई सदा हरती बरती है । तौ लगि ता मन मोहन की अँखियाँ निसि चौस हहा करती है ॥२०५॥ शब्दार्थ-वारति = न्यौछावर करती हुई । ज्यौ = जीव, प्राण । ती = स्त्रियाँ । मान सकै घर = जो मान धारण कर सके । रती = रत्ती के समान । हरती बरती है = आकुल रहती है । तौ लगि = तेरे लिए । निसि द्यौस = रात- दिन । हहा करती है = अनुनय-विनय करती रहती है । अर्थ-मानवती राधा को उसकी सखी समझाती हुई कहती है कि हे राधे ! जिस कृष्ण पर चारो ओर के राजाओ की सभी स्त्रियाँ अपने प्राणो

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