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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२८६ रसखान-ग्रन्थावली

को न्यौछावर करते हुए नही थकती । ऐसी स्त्रियाँ कहाँ है जो कृष्ण से विमुख होकर मान धारण कर सके, भले ही उनकी सुन्दरता मे रति भी रत्ती के समान हो, नगण्य हो । जिस आनन्द-सागर कृष्ण को देखने के लिए सभी स्त्रियाँ सदा ही आकुल रहती है, उसी मनमोहन कृष्ण की आँखे रात-दिन तेरे लिए अनुनय-विनय करती रहती है । (अत तू अपना मान छोड़कर कृष्ण से शीघ्र मिल ।) विशेष-१. यमक, व्यतिरेक, उपमा । २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्था- वली' मे नही है । सवैया मान की औधि है आधी घरी अरी जौ रसखानि डरै हित के डर । कै हित छोड़ियै पारियै पाइनि ऐसे कटाछनही हियरा-हर ॥ मोहनलाल को हाल विलोकियै नेकु कछु किनि छूवै कर सो कर । ना करिवे पर वारे है प्रान कहा करि है अब हाँ करिवे पर ॥२०६॥ शब्दार्थ—औधि = अवधि । हित = प्रेम । कै = या तौ । हियरा हर = हृदय को हर; मन को जीत लो । अर्थ-कोई गोपी अपनी मानिनी सखी राधा को समझाती हुई कहती है कि यदि आनन्द-सागर प्रेम के कारण डर जाये तो मान की आधी घडी होनी चाहिए, अर्थात् यदि कृष्ण तेरे मान से भयभीत हो गये है तो मुझे अपना मान छोड देना चाहिए । या तो तुम उनसे प्रेम ही छोड दो, और यदि प्रेम को नही छोड सकती तो उसके पैरो मे पडकर ऐसी तिरछी दृष्टि से देखो कि उसके मन को ही जीत लो । तुम अपने वियोग मे कृष्ण का तनिक हाल तो देखो, वह बेचारा तुम्हारे विरह मे हाथ मल रहा है । वह तुम्हारी 'नही' पर ही अपने प्राणो को न्यौछावर करता है । न जाने 'हाँ' करने पर वह क्या करेगा । विशेष-परम्परागत वर्णन है । सवैया तू गरवाइ कहा झगरै रसखानि तेरे बस बावरो होसै । तौ हूँ न छाती सिराइ अरी करि झार इतै उतै बाझिन कोसै ।