भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

व्याख्या भाग २८७ लालहि लाल कियें अँखियाँ गहि लालहि काल सो क्यो भई रोसै । ए विधना तू कहा री पढी बस राख्यो गुपालहिं लाल भरोसै ॥२०७॥ शब्दार्थ—गरवाइ=गर्व करके । सिराइ=ठंडी पडना । करि भार= डाह करके । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी राधा को समझाती हुई कहती है कि तू गर्व करके मुझसे क्या झगड़ा करती है। आनन्द सागर कृष्ण तेरे प्रेम मे पागल होकर तेरे वश मे हो गये है, तो भी तेरी छाती ठंडी नही हुई और डाह करके फिर भी मुझे वंध्या होने की गाली देती है। कृष्ण तेरे लिए लाल आँखे किये हुए है, अर्थात् आतुरता से तेरी प्रतीक्षा करते है । कृष्ण को अपने वश मे करके भी काल की भाँति क्यो क्रोध करती है। हे दैव ! तूने यह विद्या कहाँ से पढी है कि तूने कृष्ण को अपने प्रेम का झूठा विश्वास दे दिया है और वह तेरे ही भरोसे रहता है । विश ष—अनुप्रास और यमक अलकार । सवैया पिय सो तुम मान कर्यौ कत नागरि आजु कहा किनहूँ सिख दीनी । ऐसे मनोहर प्रीतम के तरुनी बरुनी पग पोछै नवीनी ॥ सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख नैननि चैन महारस भीनी । रसखानि न लागत तोहिं कछू अव तेरी तिया किनहूँ मति दीनी ॥२०८॥ शब्दार्थ—कत = क्यो । सिख = शिक्षा । वरुनी = बरौनियो से । सुधानिधि =चन्द्रमा । महारस = अत्यधिक आनन्द । अर्थ—कोई गोपी अपनी मानिनी सखी, राधा की ताड़ना करती हुई कहती है कि हे चतुर सखि ! तुम अपने प्रिय से क्यो मान कर रही हो ? तुम्हे आज क्या हो गया है ? किसने तुमको ऐसी शिक्षा दी है ? तुम्हारा प्रिय तो इतना मनोहर है कि तरुणियाँ उसके पैरो को अपनी बरौनियो से पोछती है। उसका हास्य सुन्दर है, मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है, उसके नेत्र सुख देने वाले और अत्यन्त आनन्द से भरे हुए है । ऐसा आनन्द सागर प्रिय अब तेरा कुछ नही लगता, अर्थात् तू उससे रूठी हुई है। हे तिया ! न जाने किसने तेरी मति को छीन लिया है जो तू ऐसे मनोहर प्रियतम से मान करके बैठी हुई है ।