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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

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२८८ रसखान-ग्रन्थावली विशेष-१. अनुप्रास, उपमा अलंकार । २ 'तिया' शब्द के प्रयोग मे भर्त्सना का भाव निहित है। कवित्त डहडही बौरी मंजु डार सहकार की पै, चहचही चुहल चहूँकित अलीन की। लहलही लोनी लता लपटी तमालन पै, कहकही तापै कोकिला की काकलीन की। तहतही करि रसखानि के मिलन हेत, वहवही बानि तजि मानस मलीन की। महमही मन्द मन्द मारुत मिलनि तैसी, गहगही खिलनि गुलाब की कलीन की ॥२०६॥ शब्दार्थ —डहडही = फली हुई। सहकार = आम। अलीन की = भौरों की। लहलही = हरी भरी। लोनी = सुन्दर। काकलीन की = कूजो की। तहतही = शीघ्रता । रसखानि = आनन्द सागर कृष्ण । वहवही = भद्दी । बानि = आदत, स्वभाव । मारुत = हवा । गहगही = पूर्ण विकसित । अर्थ —कोई गोपी अपनी सखी मानवती राधा से वसन्त ऋतु का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आम की बौरो से युक्त तथा फली हुई सुन्दर डाली पर चारो ओर से भौरो की गूंज आनन्दपूर्वक गूँज रही है। हरी भरी सुन्दर लताये तमाल वृक्षो से लिपटी हुई है जिनपर कोयले कूज रही है। शीघ्रता से कृष्ण से मिलने के लिए गोपियाँ अपने हृदय का मलीन स्वभाव छोडकर आतुर हो गई है। सुगन्धित मन्द मन्द मारुत चल रहा है और गुलाब की कलियाँ खिलकर पूर्ण विकसित हो गई है। ऐसे समय मे तेरा मान करना उचित नही है। सवैया जो कवहूँ मग पाँव न देत सु तो हित लालन आपुन गौनै । मेरो कह्यौ करि मान तजौ कहि मोहन सो वलि वोल सलौनै ॥ सौहै दिवावत हौ रसखानि तूं सौहै करै किन लाखनि लौनै । नोखी तूं मानिनि मान कर्यौ किन मान दसत मै कीनौ है कौनै ॥२१०॥ शब्दार्थ —सलौनै = मधुर । सौहै = सौगन्ध । सौहै = सम्मुख । लाखनि =

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