भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 306

व्याख्या भाग २८६

लाखों मे सुन्दर मुख । नोखी=विलक्षण । अर्थ—कोई गोपी अपनी मानिनी सखी राधा को समझाती हुई कहती है कि जो स्त्रियाँ कभी घर से बाहर कदम भी नही रखती, वे भी कृष्ण के लिए स्वय छिपकर गमन करती है, अर्थात् कृष्ण मे इतना आकर्षण है कि धीरा भी उनसे मिलने के लिए अधीरा बन जाती है । अत तू मेरा कहना मान कर अपना मान छोड और मोहन से मधुर-मधुर शब्दो मे बाते कर । रसखान कहते है कि मै तुझको सौगन्ध दिलाकर कहती हूँ कि हे लाखो मे सुन्दर मुखवाली तू कृष्ण के सामने जा । हे मानिनी ! तू तो बहुत ही विलक्षण है, वरना बसन्त-ऋतु मे भी कोई मान करता है ? अत तू मेरा कहना मान और अपना मान तजकर कृष्ण से बाते कर । विशेष—तृतीय और चतुर्थ पक्ति मे यमक अलकार । सखी-शिक्षा सवैया सोई है रास मैं नैसुक नाच कै नाच नचायौ कितौ सबको जिन । सोई है री रसखानि किते मनुहारनि सूँधे चितौत न हो छिन ॥ तो मै धौं कौन मनोहर भाव बिलोकि भयौ बस हाहा करी तिन । औसर ऐसो मिलै न मिलै फिर लगर मौडो कनौड़ो करै छिन ॥२११॥ शब्दार्थ—लंगर=शरारती । मौडो=बालक । कनौड़ो=कृतज्ञ । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को शिक्षा देती हुई कहती है कि हे सखि । वह वही कृष्ण है जो रासलीला मे तनिक नाच कर सबको नचाया करता है । वही आनन्द-सागर कृष्ण है जो अनेक मनुहारे करने पर भी पलभर के लिए भी सीधी तरह नही देखता; अर्थात् हर समय शरारत करता रहता है । न आने तुझ मे वह कौन-से मनोहर भाव देखकर तेरे प्रति आकृष्ट हो गया है । ऐसा अवसर शायद आगे मिले या न मिले कि वह शरारती कृष्ण तुझे कृतज्ञ करे, अर्थात् तेरे प्रति आकृष्ट हो, अत अव जो अवसर मिला है, उसे हाथ से न जाने दे । विशेष—उल्लेख अलकार । सवैया तौ पहिराइ गई चुरिया तिहिं को घर बावरी जाय भरै री । वा रसखान को ऐतौ अधीन कै मान करै चलि जाहि परैं री ॥