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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

२६० रसखान-ग्रन्थावली आवन को पुतरीत हठा करैं नैननि धार अखण्ड ढरै री । हाथ निहारि निहारि लला मनिहारिन की मनुहारि करै री ॥२१२॥ शब्दार्थ—ऐतौ अवीर ने=इस प्रकार अपने प्रेम के वश मे करके । चलि जाहि परै =दूर हट, यह स्त्रियो की भर्त्सना देने की एक प्रकार की गाली है। मनुहारि= सत्कार । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि । तुझे जो मनिहारी चूडियाँ पहना गई, तू जाकर उसका घर क्यो नही भर देती; अर्थात् उसे काफी धन क्यो नही दे देती । तू ने उस आनन्द-सागर कृष्ण को इस प्रकार अपने प्रेम के वश मे कर लिया है कि वह तेरे बिना अब एक पल भी नही रह सकता और अब तू उसके पास जाने मे हिचकिचाती है, उससे मान करती है । चल दूर हट । तेरे आने के लिए, तुझसे मिलने के लिए, कृष्ण की आँखे तुझसे अनुनय-विनय करती है और तेरे वियोग मे उसकी आँखो से निरन्तर आँसू बहते रहते है । तू ने जो चूडियाँ पहन रखी हैं, इन चूडियो वाले हाथो को देखकर कृष्ण उस मनिहारी का अवश्य सत्कार करेगे, अर्थात् उसे साधुवाद देगे । विशेष—१ यमक अलकार । २ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया मेरी सुनौ मति आइ अली उहाँ जौनौ गली हरि गावत है। हरि है विलोकति प्रानन को पुनि गाढ परे घर आवत है ॥ उन तान की तान तनी ब्रज मैं रसखानि समान सिखावत है। तकि पाय धरौ रपटाय नही वह चारो सो डारि फँदावत है ॥२१३॥ शब्दार्थ—अली=सखी । जौनौ=जिस । गाढ=विपत्ति । समान= ज्ञान । अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति सचेत रहने के लिए कहती हुई वर्णन करती है कि हे सखि । मेरी बात को ध्यान से सुनो और जिस गली मे कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाता हुआ जाता है, उस गली मे बिल्कुल मत जाओ, क्योकि देखते ही कृष्ण प्राणो को हर लेता है और फिर गोपियाँ