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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २६१ बेचारी प्रेम की विपत्ति लेकर ही अपने घरो को लौटती है। उसने अपनी बाँसुरी की तानो का सारे ब्रज मे तान तान रक्खा है, अत. मै तुझसे ज्ञान की बात कहती हूँ कि बहुत सोच समझकर पैर रखो, क्योकि वह कृष्ण इसी प्रकार फँसाता है, जिस प्रकार चारा देकर मछली को फँसाया जाता है। विशेष—१ यमक, श्लेप अलकार। २. 'तकि पाय धरौ रपटाय नही' मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है। सवैया काहे कूँ जाति जसोमति के गृह पोच भली घर हूँ तो रई ही। मानुष को डसिवौ अपुनो हँसिवौ यह बात उहाँ न नई ही ॥ बैरिनि तौ दृग-कोरनि मे रसखान जो बात भई न भई ही। माखन सौ मन लै यह क्यो वह माखनचोर के ओर नई ही ॥२१४॥ शब्दार्थ —पोच भली = चाहे कमजोर ही सही। रई = दूध मथने की लकडी। उहाँ = वहाँ पर। बैरिनि = औरतो का आत्मीयता-सूचक सम्बोधन। तौ = तेरे। न भई ही = पहले नही थी। माखन सौ = मक्खन के समान कोमल। अर्थ—कोई गोपी यशोदा के घर गई और वहाँ से कृष्ण के प्रेम के वशीभूत होकर लौटी। उसकी भर्त्सना करती हुई उसकी सखी कह रही है कि तू यशोदा के घर गई ही क्यो ? रई तो तेरे भी पास थी, भले ही वह कमजोर सही। वहाँ कृष्ण के द्वारा प्रेम का जाल फैलाकर भोली नारियो को डसना और उन नारियो के फिर अपनी हंसी कराना कोई नई बात नही है। वहाँ तो प्रतिदिन ऐसा ही होता रहता है। हे बैरिनि ! तेरे नेत्रो मे आज जो बात मै देख रही हूँ, वह पहले तो नही थी, अर्थात् आज तुम्हारी आँखों मे प्रेम की मादकता है। अपना मक्खन-जैसा कोमल हृदय लेकर तू उस माखनचोर की ओर गई ही क्यो थी ? विशेष—१ उपमा अलकार। २. अंतिम पक्ति मे 'माखन' और 'माखनचोर' का प्रयोग अत्यन्त औचित्यपूर्ण है। ३. श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे यह सवैया नही है।