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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२६२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया हेरति बारही यार उसै तुव बावरी बाल, कहा धौ करैंगी । जौ कवहूँ रसखानि लखै फिर क्यो हूँ न वीर ही धीर धरैगी ॥ मानि है काहू की कानि नही, जब रूप ठगी हरि रंग ढरैंगी । यातै कहौ सिख मानि भटू यह हेरनि तेरे ही पैडे परैंगी ॥२१५॥ शब्दार्थ—हेरति=देखती है । वीर=सखी । कानि=लज्जा, भय । रग= प्रेम । सिख=शिक्षा । भटू=सखी । हेरनि=देखा । नैडे=पीछे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि ! तू वार-वार कृष्ण की ओर देखती है । हे पगली ! तू नही जानती कि इसका परिणाम क्या होगा ? यदि कभी आनन्द-सागर कृष्ण ने तेरी ओर देख लिया तो, हे सखि ! फिर तू अपना सारा धैर्य खो बैठेगी और उसमे अनुरक्त हो जायेगी । तब तू किसी भी प्रकार की लज्जा नही पावेगी और कृष्ण के प्रेम मे रग जायेगी । हे सखि ! इसलिए मैं तुझसे कहती हूँ कि तू मेरी शिक्षा मान, अन्यथा यह देखना तेरे ही पीछे पड जायेगा, अर्थात् जब तू कृष्ण से प्रेम करने लगेगी तो फिर तुझे बडी व्याकुलता होगी, तेरा सुख-चैन सब दूर हो जायेगा । सवैया बाँके कटाछ चितैवो सिख्यो बहुधा वरज्यौँ हित कैं हितकारी । तूं अपने ढग की रसखानि सिखावनि देति न हौं पचिहारी ॥ कौन की सीख सिखी सजनी अजहूँ तजि दै बलि जाउं तिहारी । नन्द के नन्दन के फन्द अजूं परि जैहै अनोखी निहारिनिहारी ॥२१६॥ शब्दार्थ—कटाछ=कटाक्ष, तिरछी दृष्टि से । हितकारी=प्रेम करने वाला पति । हौ पचिहारी=मैं कोशिश करके हार गई हूँ । निहारिनिहारी= देखने वाली । अर्थ—कोई गोपी अपनी मानिनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि ! तूने बाँकी-तिरछी दृष्टि से देखना तो सीख लिया है, अर्थात् तू प्रेम करना तो जान गई है, पर प्राय अपना अपने प्रेम करने वाले पति की भर्त्सना कर देती है । तू तो अपने ही प्रकार की आनन्द-सागर से भरी हुई युवती है, जो मेरी शिक्षा नही मानती । मैं तो तुझे शिक्षा देते-देते कोशिश