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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २६३ करके हार गई हूँ। हे सजनी ! तू ने किसकी शिक्षा को ग्रहण कर लिया है ? अपना मान छोड दे, मैं तुझ पर न्यौछावर होती हूँ। हे-विलक्षण दृष्टि से देखने वाली ! यदि तू कही कृष्ण के फन्दे मे पड गई तो फिर मुसीबत आ जायेगी। अत तुझे अपना मान छोड़कर अपने प्रियतम से प्रेम करना ही उचित है। सवैया बैरिन तूँ वरजी न रहै अबही घर बाहिर बैरु वृढैगो। टोना सु नन्द छुटोना पढै सजनी तुहि देखि विसेपि पढ़ैगो ॥ हसि है सखि गोकुल गाँव सबै रसखानि तबै यह लोक रढ़ैगो। बैरु चढै घरहि रहि बैठि अटा न चढ़ै बदनाम चढ़ेगो ॥२१७॥ शब्दार्थ = वरजी न रहैं = रोकने पर नहीं रुकती। टोना = जादू। छुटोना = लडका। विसेप = विशेष। लोक = दुनिया। बैरु = आयु। अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रेम मे दिवानी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि । तू रोकने पर भी नही रुकती। यदि तेरा कृष्ण- के प्रति ऐसा ही लगाव रहा तो घर और बाहर वैर बढ जायेगा। नन्दपुत्र कृष्ण जादू के मन्त्र से तो सदा ही पढता रहता है, पर तुझे देखकर वह और भी विशेष रूप से पढेगा। सारा गोकुल गाँव तेरी हँसी उडायेगा और सारी दुनिया तेरी निन्दा करेगी। अब तेरी आयु चढ रही है; अर्थात् तू युवती हो रही है, अत तेरा घर के अन्दर बैठना ही ठीक है; अटारी पर चढ़ना ठीक नहीं है, क्योकि इससे तेरी बदनामी होगी। विशेष—१. 'वैरिनि' शब्द का प्रयोग आत्मीयता का सूचक है। २. 'बैरु चढ़े' मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है। ३. अन्तिम पषित मे लक्षणा शब्द-शक्ति और असंगति अलंकार का प्रयोग भाववर्द्धक है। सवैया गोरस गाँव ही मै विचिवो तचिवो नही नन्द-मुखानल झारन । गैल गहे चलियै रसखानि तौ पाप बिना डरियै किहि कारन ॥ नाहिं री ना भटू, क्यों करि कै वन पैठत पाइबी लाज सम्हारन । कुंजनि नन्दकुमार बसै तहाँ मार बसै कचनार की डारन ॥ २१८ ॥