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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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शब्दार्थ—तचिबो = जलना। नद-मुखानल-झारन = ननद के मुंह की आग की लपटें। गैल = मार्ग। भटू = सखी। मार = कामदेव। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से गोरस बेचने के लिए बाहर चलने के लिए कहती है। उसकी बात सुनकर वह सखी कहती है कि हे सखि ! मैं गोरस गाँव में ही बेचूँगी, क्योंकि ननद के मुख की आग की लपटों में जलना, ननद की फटकारें सुनना, अच्छा नहीं है। जब मैं बाहर जाती हूँ तो मेरी ननद कृष्ण और मुझे लक्ष्य करके अनेक प्रकार की मर्मान्तक गालियाँ देती है। यह सुनकर वह गोपी कहती है कि हम अपने रास्ते चली जायेंगी। जब तुम्हारे मन में कोई पाप ही नहीं है तो फिर तुम अपने मन में क्यों डरती हो ? यह सुनकर फिर सखी कहती है कि सखि ! मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूँगी, क्योंकि उस वन में घूमने पर जहाँ कृष्ण रहते हैं, किस प्रकार अपनी लाज संभाली जा सकती है। वहाँ कुंजों में तो कृष्ण रहते हैं और कचनार की डालियों में कामदेव निवास करता है। कहने का भाव यह है कि उस वन का, जहाँ कृष्ण रहते हैं, वातावरण ही इतना मादक है कि वहाँ पहुँचते ही मन इतना कामपूर्ण हो जाता है कि फिर उचित-अनुचित का ध्यान ही नहीं रहता। अतः मुझे गाँव से बाहर निकलना उचित नहीं है। सवैया वार ही गोरस बेंच री आजु तू माइ के मूड चढ़े कत मौड़ी। आवत जात ही होइगी साँझ भटू जमुना मतरौंड लौं औंड़ी॥ पार गए रसखानि कहै अँखियाँ कहूँ होंहिगी प्रेम कनौड़ी। राधे बलाइ ल्यौं जाइगी वाज अबै ब्रजराज सनेह की डाँडी॥२१६॥ शब्दार्थ—वार ही = इस पार ही। मौड़ी = सखी। मतरौंड = मथुरा और वृन्दावन के बीच का एक स्थान। प्रेम कनौड़ी = प्रेम के वशीभूत। अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज तू अपना गोरस नदी के इस पार ही बेच ले और नदी के उस पार न जा। क्योंकि यमुना पार से मतरौंड तक जाते-आते ही साँझ हो जायेगी। दूसरा कारण यह है कि नदी के उस पार जाने पर आनन्द सागर कृष्ण मिल जायेंगे, जिन्हें देखते ही न जाने आँखें प्रेम के वशीभूत हो जायें। फिर यह बात राधा तक भी पहुँच जायेगी और सारे ब्रज में कृष्ण के प्रेम की डोडी पिट जायेगी।