रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २६५ तुलना—'हाय दई न बिसाखी सुनै कछु है जग बाजत नेह की डौडी।' — घनानन्द कवित्त ब्याही अनब्याही ब्रज माही सब चाही तासी, दूनी सकुचाही दीठि परै न जुन्हैया की। नेकु मुसकानि रसखानि को विलोकत ही, चेरी होति एक बार कुंजनि दिखैया की॥ मेरो कह्यो मानि अन्त मेरो गुन मानिहै री, प्रात खात जात ना सकात सौहै मैया की। भाई की अटक तौ लौ सासु की हटक जौ लौ, देखी ना लटक मेरे दूलह कन्हैया की॥ २२०॥ शब्दार्थ—जुन्हैया = चाँदनी। चेरी = दासी। हटक = बाधा। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छवि का वर्णन करती हुई कहती है कि ब्रज की जितनी भी विवाहित नारियाँ और अविवाहित युवतियाँ है, सब कृष्ण को चाहती है, उससे प्रेम करती है। वैसे वे इतनी लज्जाशील है कि चाँदनी की दृष्टि भी उन पर न पड जाये, इसलिए दूने सकोच के साथ वे अपने घर से बाहर निकलती है। किन्तु उस तथा कुन्ज दिखाने वाले कृष्ण की तनिक सी मुस्कराहट को भी देख कर वे तुरन्त उसकी दासी बन जाती है। हे सखि! तुम मेरा कहना मानो और अन्त मे तुम मेरा अहसान स्वीकार करोगी। तुम्हे अपनी माँ की सौगन्ध है, तुम कभी भी प्रात काल बिना खाना खाये बन मे न जाना, अन्यथा वहाँ सारे दिन तुम्हे भूखा रहना पड़ेगा। भाई की बाधा और सासु की रुकावट मेरे मार्ग मे तब तक ही बनी हुई है, जब तक उन्होने मेरे प्रिय कृष्ण की छवि को नही देखा है; अन्यथा वे स्वयं भी उस छवि पर मुग्ध हो जायेगी। सवैया मो हित तो हित है रसखान छुपाकर जानहि जान अजानहि। सोउ चबाव चल्यौ चहुँधा चलि री चलि री खत तोहि निदानहि॥ जो चहियै लहियै भरि चाहि हिये सहियै हित काज कहा नहि। जान दै सास रिसान दै नन्दहि पानि दै मोहि तू कान दै तानहि॥२२१॥ शब्दार्थ—मो हित तो हित है = मेरी भलाई तेरी ही भलाई मे है।