रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ रसखान-ग्रन्थावली छपाकर = चन्द्रमा। चवाव = निन्दा। खत = हानि। निदानहिं = अन्त में। जो चहियै लहियै भरि चाहि = यदि कृष्ण को प्रेम पूर्वक आँख भरकर देखना चाहती है। हित काज = प्रेम के लिए। पानि = हाथ। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी को शिक्षा देती हुई कहती है कि मेरी भलाई तेरी ही भलाई है। अर्थात् मैं जो कुछ कह रही हूँ वह सब तेरी ही भलाई के लिए कह रही हूँ। तू चन्द्रमा को जानकर भी अजान क्यो बनी हुई है; अर्थात् चन्द्रमा भावोद्दीपक है, इस बात को जानकर भी तू कृष्ण से क्यो नही मिल रही है। तेरे कलंक की चर्चा चारो ओर चल रही है और इस चर्चा से अन्त मे तुझे ही हानि होगी, अत तू चल कर कृष्ण से मिल। यदि तू कृष्ण को प्रेमपूर्वक आँख भरकर देखना चाहती है तो तुझे सभी प्रकार की निन्दा सहन करनी होगी, क्योकि प्रेम के लिए क्या कुछ नही सहा जाता। अत तू सास की चिन्ता छोड़, ननद को क्रुद्ध होने दे, मुझे अपना हाथ दे; अर्थात् मेरे ऊपर विश्वास कर और कृष्ण की तानो को सुन; अर्थात् कृष्ण से मिल। विशेष—१. तृतीय पंक्ति मे यमक अलकार । २. यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रस- खान ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया तेरी गलीन मै जा दिन ते निकसे मन मोहन गोधन गावत । ये ब्रज लोग सो कौन सी बात चलाइ कै जो नहिं नैन चलावत ॥ वे रसखानि जो रीझिहै नेकु तौ रीझि कै क्यो न बनाइ रिझावत । बावरी जो पै कलंक लग्यौ तो निसंक ह्वै क्यों नहीं अंक लगावत ॥२२२॥ शब्दार्थ—गोधन = गोचारण का गीत। अंक = हृदय। अर्थ—कृष्ण प्रेम से विमुख किसी गोपी को उसकी सखी समझती हुई कहती है कि जिस दिन से तेरी गली मे से श्रीकृष्ण गोचारण का गीत गाते हुए निकले है, उस दिन से न जाने ब्रज मे लोगो ने कौन सी बात चला दी है कि तेरे नेत्र ही पटकने बन्द हो गये है। यदि आनन्द सागर कृष्ण तुझ पर तनिक भी रीझ गये है तो तू अच्छी प्रकार से रिझाकर उन्हे अपने वश मे क्यो नहीं करती, यदि तुझे प्रेम का कलंक लग ही गया है तो निर्भय होकर कृष्ण को अपने हृदय से क्यो नही लगाती ?