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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २७७ २. चतुर्थ पंक्ति मे मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग । तुलना—हम भापत है हरिचन्द पिया अहो लाडिलि देर न मामै करो । चलो फूलौ भूलाओ झुकौ उझकौ इहिं पाख पतिव्रत ताख धरौ ॥ सवैया मिलि खेलत फाग बढ्यौ अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै । कर कुंकुम लै करि कजमुखी प्रिय के दृग लावन कौ धमकै ॥ रसखानि गुलाल की धूंधर मै ब्रजवालन की दुति यों दमकै । मनौ सावन माँझ ललाई के माँझ चहूँ दिसि ते चपला चमकै ॥१६३॥ शब्दार्थ—अनुराग = प्रेम । रमकै = अठखेलियाँ । कजमुखी = कमल जैसे सुन्दर मुख वाली । लावन कौ = फेंकने के लिए । धूंघर = धुंधार । चपला = बिजली । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण गोपियो के साथ फाग खेल रहे थे । सुख की इन सौभाग्यशाली अठखेलियो मे उनका प्रेम बढ़ गया था । कमल जैसे सुन्दर मुख वाली गोपियाँ हाथ मे कुंकुम लेकर उसे उनके ऊपर फेकने के लिए अवसर ताक रही थी । रसखान कहते है कि गुलाल की धुँआधार मे ब्रजबालाओ की द्युति इस प्रकार चमक रही थी, मानो सावन मास की लालिमा मे चारो ओर से बिजली चमक रही हो । विशेष—अंतिम पंक्ति मे उत्प्रेक्षा अलंकार । राधा का सौन्दर्य कवित्त आजु बरसाने बरसाने सब आनन्द सो, लाडिली बरस गाँठि आई छवि छाई है । कौतुक अपार घर घर रग विसतार, रहत निहारि सुध बुध विसराई हैं । आये ब्रजराज ब्रजरानी दधि दानी सग, अति ही उमगे रूप रासि लूटि पाई है । गुनी जन गान घन दान सनमान, वाजे— पौरनि निसान रसखान मन भाई है ॥१६४॥ शब्दार्थ—बरसाने = वर्षा ऋतु मे । बरसाने = ब्रज का एक गाँव, राधा