रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७६ रसखान-ग्रन्थावली सवैया आवत लाल गुलाल लिये मग सूने मिली इक नार नवीली। त्यों रसखानि लगाइ हिये भटू मौज कियो मन माहि अधीनी। सारी फटी सुकुमारी हटी अंगिया दर की सरकी रगभीनी। गाल गुलाल लगाइ लगाइ कै अंक रिझाड विदा करि दीनी ॥१६१॥ शब्दार्थ—लाल=कृष्ण। सारी=साडी। अंक=हृदय। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण हाथ मे गुलाल लिये हुए आ रहे थे कि सूने मार्ग मे उन्हे एक युवती नारी मिली। उसे उन्होने अपने हृदय से लगाकर आनन्द के साथ अपनी मनचाही की। उसकी साडी फट गई, सौकुमार्य नष्ट हो गया, चोली फट गई और अपने स्थान से हट गई। कृष्ण ने उसके कपोलो पर गुलाल लगाकर, उसके हृदय से लगाकर तथा रिझाकर विदा कर दिया। सवैया लीने अबीर भरे पिचका रसखानि खारो बहु भाय भरौ जू। मार से गोपकुमार कुमार से देखत ध्यान टरौ न टरौ जू॥ पूरव पुन्यनि हाथ पर्यौ तुम राज करौ उठि काज करौ जू। ताहि सरौ लखि लाज जरौ इहि पाख पतिव्रत ताख धरौ जू ॥१६२॥ शब्दार्थ—पिचका=पिचकारी। भाय=भाव मार=कामदेव। कुमार =थोडी अवस्था के। सरौ=समक्ष, सम्मुख। पाख=पक्ष। ताख=आला। ताख धरौ=छोड दिया। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह आनद सागर कृष्ण अनेक प्रकार के भावो मे भरकर तथा अबीर भरी पिचकारी लेकर खडा हुआ था। छोटी अवस्था के गोपकुमार कामदेव जैसे दिखाई दे रहे थे जिन्हे देखते देखते ध्यान उन पर टारे से भी नही टरता था। वह तुम्हारे हाथ पूर्व जन्म के पुण्यो के कारण ही लग गया है, अत' तुम उठकर अपना काम करो और उस पर शासन करो उसको सामने देखकर लज्जा को छोडो तथा। इस पक्ष मे पतित-धर्म का त्याग कर दो। विशेष—१ द्वितीय पंक्ति मे उपमा अलकार।