रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २७५ कहती है कि आज कृष्ण ने ब्रज की गोरियो और राधा के साथ ऐसी होली खेली कि उनके अंग-अंग को रग कर कामभावना उत्पन्न कर दी। कु कुम की मार से और उसके ऊपर अनेक प्रकार के रगो को डालकर लाल गुलाल की मुट्ठियाँ विखेरकर वह कृष्ण सबको ललचा गया। उसने पिचकारियाँ छोडी, होली के गीत गाये तथा गोपियो के हृदय के हारो को तोडकर वह रग की धारा बरसा गया। रसखान कहते है कि वह रसिक और सुन्दर कृष्ण आज फागुन मे होली खेलते समय अपने अनेक अवगुणो को प्रकट कर गया। कवित्त गोकुल को ग्वल काल्हि चौमुँह की ग्वालिन सो, चाचर रचाइ एक धूमहि मचाइ गौ । हियो हुलसाइ रसखानि तान गाइ वाँकी, सहज सुभाइ सब गाँव ललचाइ गौ । पिचका चलाइ और जुवती भिजाइ नेह, लोचन नचाइ मेरे अगहि नचाइ गौ । सासहि नचाइ भोरी नदहि नचाइ खोरी, बैरनि सचाइ गोरी मोहि सकुचाइ गौ ॥१६०॥ शब्दार्थ-काल्हि = कल। चौमुँह = चारो ओर की। पिचका = पिच- कारी। भिजाइ नेह = प्रेम मे भिगोकर। खोरी = गली। बैरनि सचाइ = बैरो का बदला लेकर। सकुचाइ गौ = लज्जित कर गया। अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कल गोकुल का एक ग्वाला (कृष्ण) चारो ओर की गोपियो को घेरकर, चाँचर रचाकर धूम मचा गया। रसखान कहते है कि वह वाँकी बाँसुरी की तान सुनाकर तथा हृदय को उल्लसित करके सहज स्वभाव से सब गाँव वालो को ललचा गया है। वह अपनी पिचकारी चलाकर तथा समस्त युवतियो को प्रेम से भिगोकर और अपनी आँखो को नचाकर मेरे सारे अगो को नचा गया है। वह हमारी ही गली मे मेरी सासु को तथा भोली ननद को नचाकर और पुराने बैरों का बदला लेकर मुझे लज्जित कर गया।