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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२७४ रसखान-ग्रन्थावली वह ब्रजवाला मदमस्त मन रूपी मन का हरण करके चली जा रही है। पाठांतर—इस सवैया की अंतिम पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'जात चली रसखान अली मदमत्त मनी मन को हरि कै।' सवैया फागुन लाग्यो जब ते तब ते ब्रजमंडल धूम मच्यौ है। नारि नवेली बचै नहि एक विसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है। साँझ सकारे वही रसखानि सुरंग गुलाल लै खेल रच्यौ है। को सजनी निलजी न भई अब कौन भटू जिहिं मान वच्यौ है॥१८६॥ शब्दार्थ—नवेली=नई, युवती। अच्यो=पीना। सुरंग= सुन्दर रंग, लाल। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से होली का वर्णन करती हुई करती है कि हे सखि ! जबसे फागुन का महीना लगा है, तबसे सारे ब्रज-मंडल मे धूम मची हुई है। कोई भी युवती नारी इस धूमधाम से नही बची है और सबा ने एक विशेष प्रकार का प्रेम पी लिया है। प्रातः और साय आनंद-सागर कृष्ण लाल गुलाल लेकर फाग का खेल खेलते रहते हैं। हे सजनी ! इस फागुन के महीने मे कौन ऐसी ब्रजवाला है जो निर्लज्ज नही बन गई है ? तथा जिसका मान बचा रह गया है ? विशेष—अंतिम पंक्ति मे काकुवक्रोक्ति अलंकार। कवित्त आई खेलि होरी ब्रजगोरी वा किसोरी सग, अंग अंग इगनि अनग सरसाइ गौ। कुंकुम की मार वा पै रंगनि उद्धार उडै, बुक्का औ गुलाल लाल लाल बरसाइगौ। छोडै पिचकारिन धमारिन विगोइ छोडै, तोडै हिय-हार धार रंग बरसाइ गौ। रसिक सलोनो रिझवार रसखानि आजु, फागुन मै औगुन अनेक दरसाई गौ ॥१८६॥ शब्दार्थ—अनग=कामदेव। तरसाइ गौ= ललचा गया। धपारिन= होली-गीत । सलोनो=सुन्दर। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की होली का वर्णन करती हुई