रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २७३ फाग-लीला सवैया खेलतु फाग लख्यौ पिय प्यारी को ता सुख की उपमा किहि दीजै । देखत ही बनि आवै भलै रसखान कहा है जो वारि न कीजै ॥ ज्यौ ज्यौ छवीली कहै पिचकारी लै एक लई यह दूसरी लीजै । त्यौ त्यौ छवीलो छकै छवि छाक सो हेरै हँसे न टरै खरौ भीजै ॥१८६॥ शब्दार्थ—किहि = किस प्रकार । वारि = न्यौछावर करना । छकै छवि छाक सो = रूप के नशे मे मस्त होते है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से फागलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैने कृष्ण और उनकी प्यारी राधा को फाग खेलते हुए देखा । उस समय की जो शोभा थी, उसकी किस प्रकार उपमा दी जा सकती है । उस समय की शोभा तो देखते ही बनती है और कोई भी ऐसी वस्तु नही है जो उस शोभा पर न्यौछावर न की जा सके । ज्यो-ज्यो वह सुन्दरी राधा चुनौती देकर एक के बाद दूसरी पिचकारी कृष्ण के ऊपर चलाती है, त्यो-त्यो वे रूप के नशे मे मस्त होते जाते है । राधा की पिचकारी को देखकर वे हँसते तो है, पर वे वहाँ से भागे नही और खडे-खड़े भीगते रहे । विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया खेलत फाग सुहागभरी अनुरागहिं लालन कौ भरि कै । मारत कुकुम केसरि के पिचकारिन मै रग को भरि कै ॥ गेरत लाल गुलाल लली मन मोहिनि मौज मिटा करि कै । जात चली रसखानि अली मदमत्त मनी-मन को हरि कै ॥१८७॥ शब्दार्थ—अनुरागहिं = प्रेम को । मनी-मन = मन रूपी मणि । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से होली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! सौभाग्यवती ब्रजवालाएँ कृष्ण के प्रेम को हृदय मे धारण करके फाग (होली) खेल रही है । वे कु कुम और केसर को तथा रंग भरी पिचकारी को कृष्ण के ऊपर छोड रही है । ब्रजवालाएँ, जो मन को मोहने वाली हैं, अपने सुख को भुलाकर कृष्ण के ऊपर लाल गुलाल डाल रही हैं। हे सखि !