रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ रसखान-ग्रन्थावली है कि यद्यपि अपनी पुत्रवधू को उसकी सास ने रासलीला मे आने से अच्छी प्रकार रोक दिया, तथापि वह न रुक सकी । अपनी आज्ञा का उल्लघन देखकर सास बहुत लज्जित हो रही है । यदि मुझसे वह यह बात कहती तो मैं तुरन्त उत्तर दे देती कि यह कहाँ की बात है । आनन्द-सागर कृष्ण इतने धृष्ट हो गये हैं कि वे किसी गोपी को अपने वश मे करना चाहते है, तभी तो वे बार- बार उसकी ओर झुकझुककर आते है । जब से कृष्ण ने उस गली मे रासलीला की है, तब से उसने सभी गोपियो को पूर्णतया अपने वश मे कर लिया है । विशेष— १. मुहावरो का सुन्दर प्रयोग । २ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया देखत सेज बिछी री अच्छी सु विछी विप सो भिदिगौ सिगरे तन । ऐसी अचेत गिरी नहि चेत उपाय करे सिगरी सजनी जन । बोली सयानी सखी रसखानि वचै यौ सुनाइ कह्यो जुवती गान । देखन कौ चलियै री चलौ सब रास रच्यौ मनमोहन जू वन ॥१८४ ॥ शब्दार्थ—अच्छी = अच्छी । भिदिगौ = दौड गया । सयानी = चतुर । अर्थ—रासलीला के प्रभाव से एक गोपी इतनी भाव-विभोर हो गई कि उसे अपनी सुधि ही न रही । उसी की अवस्था का वर्णन एक गोपी अपनी सखी से कर रही है कि एक गोपी अपनी अच्छी सेज को बिछी देखकर उस पर सोना चाहती थी कि इतने मे बाँसुरी की ध्वनि सुनाई दी । उसे सुनकर उसके सारे शरीर मे विष-सा फैल गया । वह ऐसी अचेत होकर गिरी कि उसकी सारी सखियो ने अनेक उपाय किये, पर उसे चेत नही हुआ । तब एक चतुर गोपी ने अपनी सखियो को बताया कि इसकी अचेतना तभी हट सकती है जब इसको सुनाकर यह कहा जाये कि हे सखि ! कृष्ण ने वन मे रास रचा है, अत सब उसे देखने के लिए चलो । तुलना— १ 'दुसह विरह दारुन दसा, रहै न और उपाय । जात जात ज्यो राखियतु, पिय को नाम सुनाय ॥ —बिहारी २. 'मोहि घरीक जिवायौ चहै तो । कहै किन वाही बिसासी की बाते ।' —किशोर