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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२७८ रसखान-ग्रन्थावली इसी गाँव की रहने वाली थी। रंग विसतार = आनंद का प्रसार। निसान = नगाडा । अर्थ - राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखी ! आज वर्षा ऋतु मे बरसाने गाँव के सभी निवासी प्रसन्न हैं, क्यो आज प्यारी राधा की वर्षगाँठ है, इसीलिए चारो ओर शोभा छाई हुई है। हर स्थान पर अपार आश्चर्य और आनन्द का प्रसार है जिसे देखकर लोग अपनी सुधि-बुधि भूल जाते है। दही वा दान लेने वाले कृष्ण राधा के साथ यहाँ आये है। वे अत्यन्त प्रसन्न है, क्योकि उन्हे रूप-राशि राधा को लूटने का अवसर मिला है। गाँव मे हर स्थान पर गुणी व्यक्ति गीत गाते हुए सम्मानपूर्वक धन का दान कर रहे है और सर्वत्र मनोहर नागडे बज रहे है विशेष—यह कवित्त श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली मे नही है । कवित्त कैधो रसखान रस कोस दृग प्यास जानि, आनि कै पियूप पूप कीनो विधि चद घर कैधो मनि मानिक बैठारिवै को कंचन मैं, जरिया जोवन जिन गढिया सुघर घर । कैधो काम कामना के राजत अधर चिन्ह, कैधों यह भौर जान वोहित गुमान हर । एरी मेरी प्यारी दुति कोटि रति रम्भा की, वारि डारो तेही चित चोरनि चिबुक पर ॥१६५॥ शब्दार्थ—रस कोस—आनन्द-निधि । पियूप पूप = अमृत का सार । विधि = ब्रह्म। गढिया सुघर घर = सुन्दर घर बना लिया। वोहित = नौका । गुमान हर = गर्व को नष्ट करने वाला। दुति = शोभा । अर्थ—कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि ब्रह्मा ने ससार को प्यासा जानकर उसकी तृप्ति के लिए तुम्हारे नेत्रो मे आनन्द-निधि भर दिया है। तुम्हारा मुख इतना सुन्दर है जैसे अपने अमृत-सार को सजोकर स्वय चन्द्रमा उपस्थित हो गया हो । तुम्हारे शरीर का गठन ऐसा है जैसे सोने मे मणि-मुक्ताओ को जडने के लिए कुशल जडिया यौवन ने