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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २७६ सुन्दर घर (रत्न जड़ने के लिए) स्थान बना दिया हो । तुम्हारे अधरो की लाली काम कामना जैसी सुशोभित है । तुम्हारी नासिका का छिद्र उस भौंरे के समान है जिसमे ज्ञान की नौका का गर्व नष्ट हो जाता है, अर्थात् सुधि-बुधि नष्ट हो जाती है । मेरी प्यारी सखी राधा ! तेरी मनोहर चिबुक पर मै करोडो रति और रम्भा की शोभा को न्यौछावर करती हूँ। विशेष —यह कवित्त श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया श्री मुख यौ न बखान सकै वृषभान सुता जू को रूप उजारो । हे रसखान तू ज्ञान सभार तरैनि निहार जु रीझन हारो । चारु सिंदूर को लाल रसाल लसै ब्रज बाल को भाल टिकारो । गोद मे मानौ विराजत है घनस्याम के सारे को सारे को सारो ॥१६६॥ शब्दार्थ—श्रीमुख=मुख की शोभा । वृषभान सुता=राधा । तरैनि= नक्षत्र । रसाल=सरस । टिकारो=टीका । घनस्याम के सारे की सारे को सारो=मगल । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! राधा के मुख की शोभा का कौन वर्णन कर सकता है। उसका सौन्दर्य प्रकाशित करने वाला है। रसखान कहते है कि हे मनुष्य ! तू अपना ज्ञान सभाल और यदि तू राधा के रूप का कुछ बोध करना चाहता है तो नक्षत्रो की ओर देख, अर्थात् जिस प्रकार नक्षत्रों की प्रभा अनुपम है, उसी प्रकार राधा का रूप भी अद्वितीय है । उस ब्रजबाला के मस्तक पर लगा हुआ सिन्दूर का टीका अत्यन्त सुन्दर एवं सरस है । वह टीका ऐसा प्रतीत होता है मानो चन्द्रमा की गोद मे मंगल सुशोभित हो । विशेष—१. उत्प्रेक्षा अलकार । २ 'घनस्याम के सारे की सारे को सारो' मे क्लिष्टत्व दोष है क्योकि इसका अर्थ क्लिष्टता से निकलता है—घनस्याम का साला= चन्द्रमा; चन्द्रमा की स्त्री=बीरबहूटी; बीरबहूटी का भाई मगल । ३ यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रंथावली' मे नही है ।