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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

२६८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया अति लोक की लाज समूह मै छोरि कै राखि थकी वहु सकट सो । पल मै कुलकानि की मेड नखी नहि रोकी रुकी पल के पट सो ॥ रसखानि सु केतो उचाटि रही उचटी न सकोच की औचट सो । अलि कोटि कियौ हटकी न रही अटकी अँखियाँ लट की लट सो ॥१७८॥ शब्दार्थ—समूह मै = भीड मे ही। मेड = सीमा। नखी = लाघ दी। पल के पट सो = पलक रूपी वस्त्र मे। उचाटि = व्याकुल। औचट = ठेस, चोट। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! भीड़ मे ही अत्यधिक लोक की लाज को छोडकर मै अत्यन्त सकटमे पड़कर थक गई, क्योकि उस समय भी मैं अपने मन को काबू मे न रख सकी। कृष्ण को देखते ही क्षणभर मे ही कुल की मर्यादा की सीमा मैने लाँघ दी, अर्थात् कुल-लाज को छोड दिया। मेरी दृष्टि पलको के वस्त्र मे भी नही रुक सकी। रसखान कहते है कि मैं चाहे जितनी व्याकुल रही, पर मैं सकोच की चोट से पृथक् न हो सकी, अर्थात् सकोच किये बिना न रह सकी। हे सखि ! मैने करोड़ो प्रयत्न किये, पर स्वय को न रोक सकी और मेरी आँखे कृष्ण की लटकती हुई कु तल-राशि मे उलझ गई। रास लीला कवित्त अधर लगाइ रस प्याइ बाँसुरी बजाइ, मेरो नाम गाइ हाइ जादू कियौ मन मैं । नटखट नवल सुघर नन्दनन्दन ने, करि कै अचेत चेत हरि कै जतन मैं । झटपट उलट पुलट पट परिधान, जान लागी लालन पै सबै वाम वन मै । रस रास सरस रँगीलो रसखानि आनि, जानि जोर जुगुति विलास कियौ जन मै ॥१७६॥ शब्दार्थ—नवल = युवक। सुघर = सुन्दर। जतन मैं = यत्नपूर्वक। पट = वस्त्र। वाम = स्त्री। सरस = आनन्द देने वाला। अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला का वर्णन करती हुई कहती

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