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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २६६ है कि जब कृष्ण ने अपनी बाँसुरी को अपने अधरो से लगाकर और उसे अधरो का रस पिलाकर तथा मेरा नाम आकर बजाया तो मेरे मन पर मानो वह जादू कर गया । नटखट युवक सुन्दर कृष्ण ने मुझे अचेत करके यत्नपूर्वक हरि के ध्यान मे लगा दिया, अर्थात् कृष्ण के ध्यान के बिना मुझे और किसी बात का पता न रहा । बाँसुरी की ध्वनि को सुनकर सारी ब्रज की स्त्रियाँ जल्दी से अपने वस्त्रो को उलटा-सीधा पहनकर वन मे पहुँच गई । तब सुन्दर रास रचने वाले सरस और रँगीले कृष्ण ने वहाँ आकर रासलीला की तथा युवतियो. का समूह एकत्र करके उनके साथ आनन्द मनाया । सवैया काछ नयो इकती बर जेउर दीठि जसोमति राज कर्यौ री । या ब्रज-मडल मे रसखान कछू तब ते रस रास पर्यौ री ॥ देखियै जीवन को फल आजु ही लाजहिं काल सिगार हौ बौरी । केते दिनानि पै जानति हौ अँखियान के भागनि स्याम नच्चोरी ॥१८६॥ शब्दार्थ—काछ = कटिवस्त्र । इकती = अद्वितीय, अनुपम ।- जेउर = जेवर- आभूषण । दीठि = ढिठौना, काजल का टीका (माताएँ अपने बच्चो को काजल का टीका इसलिए लगा देती है ताकि उन्हे किसी की नजर न लग जाये) । राज = सुन्दर । बौरी = पगली । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से रास-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि रासलील। के लिए तत्पर कृष्ण का कटि-वस्त्र अनुपम और नवीन है । वे सुन्दर आभूषण पहने हुए है । यशोदा ने उसके माथे पर सुन्दर ढिठौना लगाया हुआ है। हे पगली ! जब से इस ब्रज-मंडल मे आनन्द-सागर कृष्ण ने रासलीला करनी शुरू की है, तब से ब्रजवासियो मे नवीन जीवन का सचार हो गया है । अपने जीवन के पुण्य बल से प्राप्त इस रासलीला का आज तो देखकर आनन्द उठा ले, कल से लज्जा का श्रृंगार कर लेना; अर्थात् लज्जा को त्याग कर रासलीला को देख, क्योकि न जाने कितने दिनो के पश्चात् इन आँखो के भाग्य से कृष्ण नृत्य करेगे । विशेष—१. 'बौरी' शब्द का प्रयोग घनिष्ठ आत्मीयता का सूचक है । २. श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्था- वली' मे यह सवैया नही है ।

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