रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० रसखान-ग्रन्थावली सवैया आजु भटू इक गोपकुमार ने रास रच्यौ इक गोप के द्वारै । सुन्दर बानिक सौं रसखानि बन्यौ वह छोहरा भाग हमारै ॥ ए बिधना ! जो हमै हँसती अब नेकु कहूँ उतको पग धारै । ताहि वदौं फिरि आवै घरै बिनही तन औ मन जोवन वारै ॥१८१॥ शब्दार्थ—भटू=सखी। बानिक=वेश। बदौं=शर्त लगाकर कहती हूँ। वारै=न्यौछावर करके। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज एक गोप ने (कृष्ण ने) दूसरे गोप के द्वारे पर रास-लीला रचाई। हमारे सौभाग्य से वह नन्द पुत्र कृष्ण अच्छे वेश वाला बन गयः, अर्थात् उसकी छवि द्विगुणित हो गई। हे भगवान् ! जो हमारे प्रेम को लक्ष्य करके हमारे ऊपर हँसती है, अब यदि वह तनिक भी उस ओर चली जाये तो मैं शर्त लगाकर कहती हूँ कि वे अपना मन और यौवन कृष्ण पर न्यौछावर किये बिना अपने घर वापिस नही आ सकती । सवैया आज भटू मुरली-बट के तट नद के साँवरे रास रच्यौ री । नैननि सैननि वैननि सो नहि कोऊ मनोहर भाव वच्यौ री ॥ जद्यपि राखन कौ कुल कानि सबै व्रज-वालन प्रान पच्यौ री । तद्यपि वा रसखानि के हाथ विकानी की अंत लच्यौ पै लच्यौ री ॥१८२॥ शब्दार्थ—भटू—सखी। साँवरे—कृष्ण ने अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण द्वारा रचाई गई रासलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखी ! आज मुरली-वट के नीचे श्रीकृष्ण ने रासलीला रची थी। उसमे उन्होने जो प्रदर्शन किया, वह इतना विविधतापूर्ण था कि उनकी आँखो से, सैनो से तथा वचनो से कोई भी मनोहर भाव नही बचा, अर्थात् अपने आंगिक और वाचिक नृत्यो के द्वारा उन्होने सभी प्रकार के मनोहर भावो की अभिव्यक्ति कर दी थी। यद्यपि अपने वंश की मर्यादा का पालन करने के लिए सारी ब्रज-बालाओ ने प्राणपण से प्रयत्न किया, तथापि वे अंत मे अपने प्रण से झुक गई और आनन्द-सागर कृष्ण के हाथ विक गई । अर्थात् सभी ब्रज-बनिताएँ कृष्ण की छवि पर मुग्ध हो गई ।