रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
व्याख्या भाग २४६ था । मैं अनेक प्रकार की भूल कर चुकी थी, जिन्हें मैं भूल गई, पर उस दिन जो भूल कृष्ण-मिलन का कारण हुई थी, वह भुलाए नही भूली जाती । विशेष-यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नहीं है । सवैया समुझै न कछू अजहूँ हरि सो ब्रज नैन नचाइ नचाइ हँसै । नित सास की सीरी उसासनि सौं दिन ही दिन माइ की कांति नसै । चहुँ ओर बवा की सौं सोर सुनै मन मेरेऊ आवति री सकसै । पै कहा करौ वा रसखानि विलोकि हियो हुलसै हुलसै हुलसै ॥१४५॥ शब्दार्थ-सोर = बदनामी । सकसै = उलझ । हुलसै = प्रसन्न होना । अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अन्य गोपी के आकर्षण को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखी ! वह आज भी कुछ नही समझती, वरन् कृष्ण को देखकर ब्रज में आँखे नचा-नचाकर हँसने लगती है । नित्य सासु की ठंडी साँसो से उस गोपी की कांति दिन-दिन क्षीण होती जा रही है । मैं बाबा की सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि चारो ओर उसकी बदनामी को सुनकर मेरे मन मे उलझन पैदा हो गई है । लेकिन क्या करूँ, उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखकर उसका हृदय बार-बार हुलसने लगता है, अर्थात् वह अपनी बदनामी की चिन्ता न करके बराबर कृष्ण मे अनुरक्त है । विशेष-अन्तिम पंक्ति मे 'हुलसै' शब्द की आवृत्ति भावो मे तथा प्रभाव मे अभिवृद्धि का कारण है । सवैया मारग रोकि रह्यौ रसखानि के कान परी झनकार नई है । लोग चितै चित दै चितए नख तै मन माहि निहाल भई है । ठोढी उठाइ चितै मुसकाइ मिलाइ कै नैन लगाइ लई है । जो बिछिया बजनी सजनी हम मोल लई पुनि बेचि दई है ॥१४६॥ शब्दार्थ-नख ते = नख से शिख तक, पूर्ण रूप से । निहाल = प्रसन्न । बिछिया = पैर का एक आभूषण । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आनन्द-सागर कृष्ण ने राधा का मार्ग रोका और उसके कानो मे एक नवीन झकार पडी ।
२५० रसखान-ग्रन्थावली उस झकार को लोगो ने चित्तपूर्वक सुना और राधा भी उसकी झंकार सुनकर पूर्ण रूप से प्रसन्न हो गई। कृष्ण ने उसकी ठोढी उठाकर देखा और उसकी ओर मुस्कराये तथा उन दोनो के नेत्रो से नेत्र मिले। हे सजनी ! जो बजने वाली विछिया हमने खरीदी थी, अर्थात् हमारी क्रीतदासी थी, उसीने हमे कृष्ण के हाथ बेच डाला। अर्थात् उसी की ध्वनि सुनकर कृष्ण हमारे पास आते रहे और हमारा प्रेम अगाढ़ होता रहा। सवैया जमुना-तट वीर गई जब तें तब तें जग के मन माँझ तही। ब्रज मोहन गोहन लागि भटू हौं लटू भई लूट सी लाख लही। रसखान लला ललचाय रहे गति अपनी हौ कहि कासो कहौ। जिय आवत यो अवतों सद भाँति निसक ह्वै अंक लगाय रहौ ॥१४७॥ शब्दार्थ = वीर = सखी। तही = जलती हूँ, ईर्ष्या का कारण बन गई हूँ। गोहन = साथ। भटू = सखी। लटू भई = मुग्ध हो गई। लूट सी लाख लही = लाखो की सम्पत्ति (प्रेम-सम्पदा) लूट मे प्राप्त कर ली। अंक = हृदय। अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब से मै यमुना-तट पर गई हूँ और वहाँ कृष्ण से मिलन हुआ है, तब से सारा ससार मुझ से ईर्ष्या करने लगा है। हे सखि ! मैं कृष्ण के साथ रहकर इतनी मुग्ध हो गई कि लाखो की प्रेम-सम्पत्ति मुझे लूट मे ही मिल गई। तब से आनन्द-सागर कृष्ण मुझे अपनी ओर इतना अधिक आकृष्ट कर रहे है कि मै अपनी इस अवस्था का वर्णन किसी से भी नही कर सकती। अब तो मेरे मन मे यही आता है कि मै ससार के और समाज के सारे बन्धनो को छोडकर तथा निर्भय होकर कृष्ण के हृदय से लगी रहूँ। विशेष - यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नही है। सवैया औचक दृष्टि परे कहुँ कान्ह जू तासो कहै ननदी अनुरागी। सो सुनि सास रही मुख मोहि जिठानी फिरै जिय मैं रिस पागी। नीके निहारि कै देखे न आँखिन हौं कवहूँ भरि नैन न जागी। मो पछितावो यहै जु सखी कि कलंक लग्यौ पर अंक न लागी ॥१४८॥
व्याख्या भाग २५१ शब्दार्थ - औचक = अचानक । अनुरागी = प्रेमिका । रिस = क्रोध । भरि नैन न जागी = आँखो मे छवि भरकर जागने का अवसर भी नही मिला । अक = हृदय । अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! अचानक ही कृष्ण मुझे दिखाई पड गये और मै उन्हे देखने लगी । इसी पर ननद ने मेरी यह बदनामी फैला दी कि मै कृष्ण मे अनुरक्त हूँ और उनकी प्रेमिका हूँ । इस बदनामी को सुनकर सासु ने मुझ से मुँह मोड लिया है और जिठानी क्रोध मे भर कर फिर रही है । हे सखि ! तू अच्छी प्रकार से मेरी आँखों मे झाँक कर देख, तब तुझे पता चलेगा कि मै कभी भी इन आँखो मे कृष्ण के रूप की छवि भरकर नही जागी हूँ । हे सखि ! मुझे केवल यही पछतावा है कि कृष्ण-प्रेम का मुझे कलंक तो लग गया है, पर मै कभी भी उसके हृदय से नही लग पाई हूँ । विशेष - अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार । तुलना - 'लागे कलकहुँ अक लगे नहि तो सखि भूल हमारी महा है।' — हरिश्चन्द्र सवैया सास की सास नही चलिवो चलियै निसिद्यौस चलावै जिही ढग । आली चबाव लुगाइन के डर जाति नही न नदी ननदी-सग । भावती औ अनभावती भीर मै छुवै न गयौ कबहुँ अंग सो अग । घैरु करै घरुहाईं सबै रसखानि सौ मो सौ कहा कै भयो रग ॥१४६॥ शब्दार्थ - सासनही = आदेश के अनुसार । निसिद्यौस = रात-दिन । चबाव = बदनामी की चर्चा । भावती = प्रिय । अनभावती = अप्रिय । घैरु = बदनामी । घरुहाईं = बदनाम करने वाली स्त्रियाँ । रग = प्रेम । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का उल्लेख करते हुए कहती है कि यद्यपि मै सासु के आदेश के अनुसार ही चलती हूँ । वह रात-दिन जिस प्रकार चलाती है, उसी प्रकार चलती हूँ, अर्थात् हर प्रकार से प्रत्येक समय उसकी आज्ञा का पालन करती हूँ । अन्य नारियो के द्वारा बदनामी की चर्चा के डर से मै अपनी ननदी के साथ नदी के किनारे भी नही जाती । प्रिय तथा अप्रिय भीड मे भी मेरा शरीर कभी भी उसके शरीर से छुआ नही है । फिर भी बदनाम करने वाली सभी स्त्रियाँ मेरी बदनामी
२५२ रसखान-ग्रन्थावली करती है। आनन्द-सागर कृष्ण के साथ मेरा प्रेम क्या हुआ मानो एक आफत ही मैंने मोल ले ली। विशेष—इन पक्तियो मे प्रेमिका गोपी का भोलापन अकित है। सवैया घर ही घर घेरु घनो घरिही घरिहाइनि आगैं न सांस भरौं । लखि मेरियै ओर रिसाहि सबै सतराहिं जौ सौंहैं अनेक करौं । रसखानि तो काज सबै ब्रज ती रो मेर्वैरी भयी कहि कासो लरों । बिनु देखे न क्यो हूँ निमेपै लगै तेरे लेखेँ न हूँ या परेखै मरौं ॥१५०॥ शब्दार्थ—घरही घर = प्रत्येक घर मे । घेरु = बदनामी की चर्चा । घरिही = घडी भर मे ही । घरिहाइनि = बदनामी करने वानी । सौहैं = सौगन्ध । तो काज = तेरे कारण । निमेपै = पलक । परेखे = पछतावे । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से अपनी विवश स्थिति का वर्णन करती हुई कहती है कि तुम्हारे प्रेम के कारण प्रत्येक घर मे घड़ी भर मे ही मेरी बहुत अधिक बदनामी फैल गई है जिसके कारण मै बदनाम करने वाली स्त्रियो के सामने साँस भी नही भर सकती । यदि मै अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए अनेक सौगन्ध खाती हूँ तो वे भृकुटी चढाकर तथा मेरी ओर देखकर क्रोध करती है । हे आनन्द-सागर कृष्ण । तेरे कारण मारा ब्रज मेरा शत्रु बन गया है । तुम्ही बताओ अव मै किस-किस से लडती फिरूँ । तुम्हारे देखे विना और तुम्हे देखते समय मेरी पलक नही लगती, अर्थात् न तो मुझे तुम्हारे वियोग मे चैन है और न तुम्हारे मिलन मे । इसी पछतावे मे मैं मर रही हूँ । विशेष—१. प्रेमजन्य विवश स्थिति का मार्मिक वर्णन है । २ प्रथम पक्ति मे अनुप्रास और यमक का सुन्दर प्रयोग है । ३. अन्तिम पक्ति मे विरोधाभास अलकार ने भावो के प्रभाव को द्विगुणित कर दिया है । तुलना—१. 'देखे निरमोही के विसे मे 'सेख' तोहि पिय, लेखे नाहि तेरे सु परेखे माहि मरिये ।' —शेख आलम २. 'सबही सही नाहि कहौ कछु पै तुव लेखे नही या परेखे मरौ ।' —हरिश्चन्द्र
व्याख्या भाग २५२ दोहा स्याम सघन घन घेरि कै, रस बरस्र्यौ रसखानि । भई दिवानी पानि करि, प्रेम-मद्य मन मानि ॥१५१॥ शब्दार्थ—स्याम = काला, कृष्ण । सघन = गहन, प्रेमपूर्ण । रस = जल, आनन्द । दिमानी = दिवानी । पानि करि = पीकर । प्रेम-मद्य = प्रेम रूपी शराब । मन मानि = छिककर, पूर्ण तृप्त होकर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! गहन बादल रूपी प्रेमपूर्ण श्याम कृष्ण ने मेरे ऊपर जल रूपी आनन्द की वर्षा की और मैंने छिककर प्रेम रूपी शराब पी । उस शराब को पीकर मै कृष्ण दिवानी हो गई । भाव यह है कि मै कृष्ण के प्रेम मे मदोन्मत्त बन गई हूँ । विशेष—श्लेष और रूपक अलंकार । सवैया कोउ रिझावन कौ रसखानि कहै मुकतानि सो माँग भरौगी । कोऊ कहै गहनो अग-अग दुकूल सुगन्ध पर्यौ पहिरौगी ॥ तूँ न कहै न कहै तो कहौ हौ कहू न कहौ तेरे पाँय परौगी । देखहि तूँ यह फूल की माल जसोमति-लाल निहाल करौगी ॥१५२॥ शब्दार्थ — मुकतानि सो = मोतियो से । दुकूल = वस्त्र । निहाल = प्रसन्न । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि । आनन्द- सागर कृष्ण को रिझाने के लिए कोई गोपी तो यह कहती है कि मै अपनी भौंहो मे मोतियो को पिरोऊँगी, कोई कहती है कि मै अपने अग-अग पर आभूषण पहनूँगी और कोई कहती है कि मै अपने वस्त्रों को सुन्दर एव मादक गन्ध से परिपूर्ण कर लूँगी । यदि तू किसी से मेरी बात न बताये और इस बात का वचन दे तो मै तुझे बताये देती हूँ कि मै तो इस फूल-माला से ही यशोदा-पुत्र कृष्ण को प्रसन्न कर लूँगी । कहने का भाव यह है कि कृष्ण को फूल-माला ही सर्वोत्तम प्रिय है, किन्तु इस बात को अन्य गोपियाँ नही जानती । विशेष—तृतीय पंक्ति मे शब्द-योजना अनुपम है ।
२५४ रसखान-ग्रन्थावली सवैया प्यारी पै जाइ कितौ परि पाइ पची समझाइ सखी की सौ बैना। वारक नन्दकिशोर की ओर कह्यौ दृग छोर की कोर करै ना। ह्वै निकस्यौ रसखान कहूँ उत डीठ पर्यौ पियरो उपरैना। जीव सो पाय गई पचिवाय कियौ रुचि नेह गये लचि नैना ॥१५३॥ शब्दार्थ—कितौ = कितना ही। परि पाउ = पैरो मे पडकर । पची समझाई = समझाकर थक गई। सौ = सौगन्ध। वारक = एक वार। डीठि पर्यो = दिखाई दिया। पियरो = पीला। उपरैना = वस्त्र। पचिवाय = वात रोग शान्त हुआ। गये लचि नैना = नेत्र लज्जा के कारण झुक गये। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति आकृष्ट किसी अन्य गोपी की प्रेम-दशा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैं तुम्हारी सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि मैंने अपनी उस प्रिय सखी के पास जाकर और उसके पैरो में पडकर यह बात इतनी वार कही कि मैं समझाते-समझाते थक गई। मैंने उससे कहा कि एक बार भी तुम कृष्ण की ओर अपनी आँखों की पलकें न उठाना। परन्तु उसकी विवशता यह है कि जब भी कृष्ण बाहर निकलते हैं और उनके पीले वस्त्र पर उसकी दृष्टि पड़ती है, तभी उसमे नवीन जीवन का-सा संचार होता हो, उसका वात रोग शान्त हो जाता है वह कृष्ण के प्रति मनोहर प्रेम का प्रदर्शन करने लगती है और इसी कारण लज्जा से उसके नेत्र झुक जाते हैं। विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया सखियां मनुहारि कै हारि रही भृकुटी को न छोर लली नचयौ। चहुँधा घन घोर नयो उनयौ नभ नायक ओर चितै चितयौ। विकि आप गई हिय मोल लियौ रसखान हितू न हियो रिझयौ। सिगरो दुख तीछन कोटि कटाछन काटि कै सौतिन बाँटि दियौ ॥१५४॥ शब्दार्थ—मनुहारि कै = अनुनय-विनय करके। नचयौ = नीचा किया। उनयौ = घिर आया। नायक = श्रीकृष्ण से तात्पर्य है। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखि से किसी अन्य मानवती गोपी का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! सारी सखियाँ उस मानवती गोपी की
व्याख्या भाग २५५ अनुनय-विनय करती हुई थक गई', पर उसके क्रोध मे, तनिक भी अन्तर नही आया। अचानक चारो ओर से आकाश मे नवीन घन घिर आया। इस उद्दीपक वातावरण के कारण उस गोपी का ध्यान कृष्ण की ओर गया। वह स्वय ही बिक गई और उसके प्रियतम कृष्ण ने उसे मोल ले लिया, अर्थात् वह पूर्णतया उसके वश मे हो गई। इस प्रकार कृष्ण ने अन्य प्रेमिकाओ के हृदय को रिझा लिया। तब उस मानवती गोपी ने अपना सारा दुख अपने तीक्ष्ण कटाक्षो के द्वारा दूर करके अपनी सौतो मे बाँट दिया; अर्थात् उसे कृष्ण के साथ देखकर अन्य सपत्नी गोपियो को दुख हुआ। विशेष— १ प्रहर्षण अलकार । २ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया खेलै अलीजन के गन मैं उत प्रीतम प्यारे सो नेह नवीनो। बैननि बोध करै इत कौ उत सैननि मोहन को मन लीनो। नैननि की चलिबी कछु जानि सखी रसखानि चितैवे कौ कीनो। जा लखि पाइ जबाइ गई चुटकी चटकाइ विदा करि दीनो ॥१५५॥ शब्दार्थ —अलीजन = सखियो का समूह । बैननि = वचनो से । चलिबी = चलना । अर्थ— कोई गोपी अपनी सखी से किसी क्रियाविदग्धा गोपी का वर्णन करती हुई कहती है कि वह सखियो के समूह मे खेल रही है, पर उस ओर प्रियतम कृष्ण के साथ उसका नवीन अनुराग हुआ था। वह वचनो से तो इस ओर का बोध करा रही थी, परन्तु सैनो से उस ओर चलने का सकेत करके कृष्ण के मन को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। हे सखि ! उसकी आँखों को चलता हुआ देखकर आनन्द-सागर कृष्ण ने उसकी ओर ध्यान दिया। कृष्ण को अपनी ओर आकर्षित देखकर उसने जँभाई ली और चुटकी बजाकर उसे विदा किया, अर्थात् सकेत से ही अभिसार-स्थल को बता दिया। विशेष— जो नायिका चातुर्य से कार्य करके अपनी इच्छा को पूर्ण करने मे—नायक को सकेत स्थल पर ले जाने मे—सफल होती है, उसे क्रियादिराघा कहते है। तुलना—१. 'कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात । भरे मौन मे कहत है नयन ही सो बात ॥'
२५६ रसखान-ग्रन्थावली २ 'ललन-चलनु सुनि पलनु मैं अँसुवा झलके आइ । भई लखाइ न सखिनु हूँ झूठे ही जमुहाइ ॥' —बिहारी सवैया मोहन के मन भाइ गयौ इक भाइ सो ग्वालिनै गोधन गायौ । ताको लग्यौ चट, चौहट सो दुरि औचक गात सो गात छुवायौ ॥ रसखानि लही इनि चतुरता चुपचाप रही जब लो घर आयौ । नैन नचाइ चितै मुसकाइ सु ओट ह्रै जाइ अँगूठा दिखायौ ॥१५६॥ शब्दार्थ—गोधन = गोचारण का गीत । चट = मन । औचक = अचानक । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से प्रेमलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि जब ग्वालिन ने मधुर स्वर से गोचारण का गीत गाया तो वह कृष्ण को बहुत अच्छा लगा और साथ ही गाने वाली गोपी के प्रति आकृष्ट हो गये । ग्वालिन ने अचानक लज्जा के कारण अपना शरीर अपने शरीर मे छिपा लिया; अर्थात् वह लज्जा के कारण सिमट गई । रसखान कहते है कि उसने इतनी चतुरता से कार्य किया कि जब तक उसका घर नही आया तब तक तो वह चुपचाप रही और जब उसका घर आ गया तो वह आँखे नचाकर, मुस्कराकर और ओट मे होकर कृष्ण को अँगूठा दिखाकर अपने घर मे घुस गई । विशेष—अनुभावो की सुन्दर योजना है। सवैया कान परे मृदु बैन मरु करि मौन रही पल आधिक साधे । नद ववा घर को अकुलाय गई दधि लै विरहानल दाधे । पाय दुहूननि प्राननि प्रान सो लाज दबै चितवै दृग आधे । नैननि ही रसखान सनेह सही कियौ लेउ दही कहि राधे ॥१५७॥ शब्दार्थ—मरु करि = कठिनाई से । आधिक = आधा । विरहानल दाधे = विरह की आग से दग्ध होकर । दबै = भयभीत होकर । चितवै = देखना । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा के प्रेम की आकुलता का वर्णन करती हुई कहती है कि जब राधा के कान मे कृष्ण के सुन्दर शब्द पडे तो
व्याख्या भाग २५७ वह कठिनता से आधे पल तक तो चुपचाप रही, फिर अकुलाकर और विरह की आग से दग्ध होकर नद बाबा के घर गई। वहाँ पर उसे कृष्ण मिले। वे दोनो एक-दूसरे को अपने प्राणो के समान प्यार करते थे। दोनो ने एक-दूसरे को आधी दृष्टि से देखा और फिर वे लज्जा के कारण भयभीत हो गये। इस प्रकार उन दोनो ने अपना प्रेम आँखो के द्वारा ही पक्का कर लिया। तब 'दही लो' राधा ने यह आवाज लगानी शुरू कर दी। विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया केसरिया पट, केसरि खौद, बनौ गर गुज को हार ढरारो। को हौ जू आपनी या छवि सो जु खरे अँगना प्रति डीठि न डारो। आनि बिकाऊ से होइ रहे रसखानि कहे तुम्ह रोकि दुवारो। 'है तौ बिकाऊँ जौ लेत बनै हँसबोल तिहारो है मोल हमारो' ॥१५८॥ शब्दार्थ—पट = वस्त्र। खौर = तिलक। ढरारो = सुन्दर। अँगना = नारी। हँसबोल = हँस कर बाते करना। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह केसरिया रंग के वस्त्र धारण किए हुए है, मस्तक पर केसरी रग का तिलक लगा हुआ है, गले मे गुँजो का सुन्दर हार पहने हुए है। इस ब्रज मे कौन ऐसी नारी है जो इस शोभा को देखकर इस पर अपनी दृष्टि नही डालेगी, अर्थात् सभी नारियाँ इस शोभा को देखे बिना नही रह सकेगी। यदि तुम्हारा द्वार रोककर वह तुमसे यह कहे कि मै बिकने के लिए हूँ और मेरा मूल्य तुम्हारा हँसकर बात करना है तो तुम भी अन्य जैसी हो जाओगी, अर्थात् अपनी सुधि-बुधि भूलकर उनके सामने पूर्ण आत्मसमर्पण कर दोगी। सवैया एक समय इक ग्वालिनि को ब्रजजीवन खेलत दृष्टि पर्यौ है। बाल प्रवीन सकै करि कै सरकाइ कै मौरन चीर घर्यौ है॥ यौ रस ही रस ही रसखानि सखो अपनो मन भायो कर्यौ है। नन्द के लाडिले ढाँकि दै सीस इहा हमरो वरु हाथ भर्यो है ॥१५६॥ शब्दार्थ—ब्रजजीवन = कृष्ण। सकै करि कै = बलपूर्वक।
२५८ रसखान-ग्रन्थावली अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से मिलन-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! एक समय एक गोपी ने कृष्ण को खेलते हुए देखा। वह बाला था और कृष्ण चतुर थे, अत कृष्ण ने बलपूर्वक अपने सिर से मोर-मुकुट उतार कर उसके सिर पर रख दिया। हे सखि ! इस प्रकार कृष्ण ने आनन्द- पूर्वक अपनी मनोकामना पूर्ण की। तब उस गोपी ने कहा—हे नन्द के प्रिय पुत्र, हमारा सिर ढँक दो, क्योकि हमारा हाथ तो खाली नही है, अत हम स्वयं अपना सिर ढँकने मे असमर्थ है। पाठातर—इस सवैया की दूसरी पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'वाल प्रवीन प्रवीनता कै सरकाय काँधे लै चीर धर्यौ है।' सवैया मै रसखान की खेलनि जीति कै मालती माल उतार लई री। मेरीये जानि कै सूधि सबै चुप ह्वै रही काहु करी न खई री। भावते स्वेद की वास सखी ननदी पहिचानि प्रचड भई री। मैं लखिवौ लखि कै अँखियाँ मुसकाय लचाय नचाय दई री ॥१६०॥ शब्दार्थ—खेलनि जीति कै=खेल मे जीत कर। मेरीये=मेरी ही है। सूधि=भोली। खई=झगडा। भावते=प्रेम के। स्वेद=पसीना। प्रचड= अत्यन्त क्रुद्ध। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मैने खेल मे आनन्द-सागर कृष्ण को जीत कर उसकी मालती की माला लेकर स्वय पहन ली। मेरी भोली सखियो ने यह समझकर कि यह माला मेरी ही है, मुझसे कोई झगडा नही किया, अर्थात् किसी प्रकार के व्यग्य नही कसे। उस माला मे से प्रेम-पसीने की सुगधि की पहिचान कर मेरी ननद मुझ पर अत्यन्त क्रुद्ध हुई। तब मैंने हँसकर, आँखो को नीचा करके और नचाकर, अर्थात् अपनी आँखो से अपने प्रेम-भाव को सूचित करके वह माला मैने उन्हे ही वापिस कर दी। विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रथावली' मे नही है। सवैया ब्रषभान के गेह दिवारी के द्यौस अहीर अहीरनि भीर भई। जितही तितही धुनि गोधन की सब ही ब्रज ह्वै रह्यौ राग मई॥
व्याख्या भाग २५६ रसखान तबै हरि राधिका यो कछु सैननि ही रस बेल बई । उहि अंजन आँखिनि आँज्यौ भटू इन कुंकुम आड लिलार दई ॥१६१॥ शब्दार्थ—द्यौस = दिन । राग मई = रागपूर्ण, प्रेमानन्द से परिपूर्ण । बई = उत्पन्न हुई । उहि = कृष्ण ने । भटू = सखी । आड = तिलक । लिलार = मस्तक । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वृषभानु के घर दिवाली के दिन अहीर और अहीरनियो की भारी भीड हुई । सब ओर से गोचारण के गीत गाये जा रहे थे जिनके कारण समूचा व्रज प्रेमानन्द से परिपूर्ण हो रहा था । उसी समय कृष्ण और राधा के मध्य नेत्रो के कुछ ऐसे संकेत हुए जिनके कारण उनके हृदयो मे आनन्द देने वाली प्रेम-बेलि उत्पन्न हुई । अपने प्रेम को साकेतिक रूप से प्रकट करने के लिए कृष्ण ने अपनी आँखो मे अंजन लगाया और राधा ने अपने मस्तक पर कुंकुम का तिलक लगाया । अंजन लगा कर कृष्ण ने संकेत से राधा को यह बताया कि मै तुम्हे अंजन की भाँति सदैव अपनी आँखो में रक्खूँगा, और तिलक लगाकर राधा ने यह प्रकट किया कि तुम्हारे कारण ही मेरा सौभाग्य बना रहेगा । विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नही है । सवैया बात सुनी न कहूँ हरि की, न कहूँ हरि सो मुख बोल हँसी है । काल्हि ही गोरस बेचन कौं निकसी व्रजवासिनि बीच लसी है ॥ आजु ही वारक 'लेहु दही' कहि कै कछु नैनन मैं बिहसी है । बैरिनि वाहि भई मुसकानि जु वा रसखानि के प्रान वसी है ॥१६२॥ शब्दार्थ—काल्हि ही = कल ही । गोरस = दही । लसी = सुशोभित होना । बारक = एक बार । अर्थ—कृष्ण-प्रेम मे व्याकुल किसी गोपी का वर्णन एक गोपी अपनी सखी से करती हुई कहती है कि हे सखि ! उसने तो कभी कृष्ण की बात भी नही सुनी, न कभी उसने हँसकर कृष्ण से बाते की हैं । यह तो कल ही दही बेचने के लिए निकली थी और व्रजवासियो के मध्य सुशोभित हो रही थी । आज
२६० रसखान-ग्रन्थावली ही वह एक बार यह कह कर कि 'दही लेओ' वह आँखो ही आँखों मे कुछ मुस्करा दी थी। उसकी वही मुसकराहट उसके लिए वैरिन बन गई और वह आनन्द-सागर कृष्ण के प्राणो मे बस गई, अर्थात् कृष्ण उस पर मुग्ध हो गये। सवैया ग्वलनि द्वैक भुजान गहै रसखानि कौ लाई जसोमति पाहै। लूटत हैं कहैं ये वन मैं मन मै कहै ये सुख-लूट कहाँ है॥ अंग ही अंग ज्यौं ज्यौं ही लगै त्यौं त्यौं ही न अंग ही अंग समाहै। वे पछलै उलटे पग एक तौ वै पछलै उलटे पग जाहै ॥१६३॥ शब्दार्थ—पाहैँ=पास। न अंग ही अंग समाहैँ=अपने अंगो मे नहीं समाती है, अर्थात् अत्यन्त प्रसन्न होती है। अर्थ—दो-एक ग्वालिन कृष्ण को बाँहो से पकड़कर यशोदा जी के पास ले गई और उनसे कृष्ण की शिकायत करने लगी कि इनसे पूछो कि ये वन मे और मन मे हमे लूटते है। भला इनसे इनको क्या सुख मिलता है ? हमारे अंग से ज्यो-ज्यो इनका शरीर छूता है तो ऐसे आनन्द का अनुभव होता है कि हम अपने अंगो मे ही नही समाती, अर्थात् अत्यन्त प्रसन्न होती है। गोपियाँ यदि एक पग लौटती है तो ये लौटकर उनके मार्ग को घेर लेते है। विशेष—उपालम्भ के माध्य से कृष्ण के प्रति गोपियो के अमित प्रेम का वर्णन है। सवैया दूर ते आई दुरे ही दिखाइ अटा चढि जाइ गह्यो तहाँ आरौ। चित्त कहूँ चितवै कितहूँ, चित्त और सो चाहि करै चखवारौ ॥ रसखानि कहै यहि बीच अचानक जाइ सिढी चढि खास पुकारौ। सूखि गई सुकुवार हियो हनि सैन पटू कह्यौ स्याम सिधारौ ॥ १६४॥ शब्दार्थ—चितवै=देखना। सिढी=सीढी। भटू=सखी। अर्थ—दूर से आते हुए कृष्ण को दिखाकर किसी गोपी ने अपनी सखी से कहा कि अटारी पर चढ कर देखो कि कृष्ण कहाँ आ गया है। यह सुन कर वह सखी ऊपर गई, पर उसका मन कही था और वह देख किसी और ओर रही थी (क्योकि उसके मन मे डर था कि घर के लोग उसे देख न ले ।) रस- खान कहते है कि जब वह कृष्ण को देख रही थी तो इसी बीच अचानक सिढ़ी
व्याख्या भाग २६१ 'पर चढ़कर उसकी सासु ने उसे आकर पुकारा । इस भय से कि कही सासु ने उन्हे देख तो नही लिया है, वह कोमलागी भय के मारे सूख गई, उसका हृदय धडकने लगा । उसकी भयग्रस्त दशा को देखकर उसकी सखी ने आँखों के इशारे से ही बता दिया कि कृष्ण चला गया है, अत. डरने की कोई बात नही है । पाठान्तर—इस सवैया की द्वितीय पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'चित्त कहूँ चितवै कितहूँ चित चोर सो चाहि करै चख चारौ ।' तुलना—'ताही समै औचक ही चढि परकारी 'सेख' सासु आनि अनजानि नीचे ते पुकारिये । मूरछि मृगाछी गिरी हियो हनि हाथनि सो । नैनन सो कह्यौ हा हा स्याम जू सिधारिये ।।' —शेख आलम दोहा बक बिलोकनि हसनि मुरि, मधुर बैन रसखानि । मिले रसिक रसराज दोउ, हरखि हिये रसखानि ॥ १६५ ॥ शब्दार्थ —बक बिलोकनि=वक्र दृष्टि । हरखि=हर्षित होकर । अर्थ—मिलन का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि वक्र दृष्टि से मुड़कर हँसते हुए और मधुर वचन बोलते हुए आनन्द सागर कृष्ण हृदय मे हर्षित होकर राधा से इस प्रकार मिले मानो रसिक और रसराज दोनो मिल गये हों । विशेष—उत्प्रेक्षा अलकार । प्रेम-वेदना सवैया वह गोधन गावत गोधन मैं जब ते इंहि मारग ह्वै निकस्यौ । तब ते कुलकानि कितीय करौ यह पापी हियो हुलस्यौ हुलस्यौ ॥ अब तौ जु भई सु भई नहि होत है लोग अजान हँस्यौ सुहँस्यौ । कोउ पीर न जानत जानत सो तिनके हिय मै रसखानि वस्यौ ॥१६६॥ शब्दार्थ—गोधन=गोचारण का गीत । गोधन मै=गऊओ के समूह मे । कितीय करौ=कितना ही करे, कितना ही रोके ।
२६२ रसखान-ग्रन्थावली अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने आकर्षण को व्यक्त करती हुई कहती है कि जब से कृष्ण गोचारण के गीत गाता हुआ गौओं के समूह के साथ इस मार्ग से निकला है, तब से यह कुल की मर्यादा चाहे जितना रोकती है, पर यह पापी हृदय बार-बार हुलस रहा है। अब तो जो हो गया है, सो हो गया है, वह टल नहीं सकता, चाहे अज्ञानी लोग कितना ही मुझ पर हँसे, मेरे हृदय की वेदना को कोई नहीं जानता, केवल वही जान सकता है जिसके हृदय मे आनन्द-सागर कृष्ण बसा हुआ है, अर्थात् जिसे कृष्ण से प्रेम है। विशेष—प्रथम पंक्ति मे यमक अलंकार है। सवैया वा मुसकान पै प्रान दियौ जिय जान दियौ वहि तान पै प्यारी। मान दियौ मन मानिक के सग वा मुख मजु पै जोवनवारी॥ वा तन कीं रसखानि पै री तन ताहि दियौ नहिं ग्यान विचारै। सो मुंह मोरि करौ अब का भए लाल लै आज समाज मे ख्वारी॥१६७॥ शब्दार्थ—मजु=सुन्दर। आन=मर्यादा। ख्वारी=बदनामी। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि! मैंने कृष्ण की मुसकराहट पर अपने प्राणो को न्योछावर कर दिया था। उसकी मधुर बाँसुरी की तान पर अपने जी को न्योछावर कर दिया था। अपने मन रूपी मोती के साथ ही मैंने अपना सम्मान भी उन्हे सौप दिया था; अर्थात् प्रेम के कारण जो बदनामी होगी, उसकी भी मैंने तनिक भी चिन्ता नहीं की थी। उसके सुन्दर मुख पर मैने अपने यौवन को न्योछावर कर दिया था। उसके शरीर पर मैंने अपना शरीर वार दिया था। इस आत्म-समर्पण मे मैंने अपनी कुल मर्यादा का भी विचार नहीं किया था। जिस कृष्ण के लिए समाज मे मेरी बदनामी हुई है, वह कृष्ण अब मुझसे मुँह मोडकर चला गया है। यह बडे ही दुख की बात है। विशेष—रूपक अलंकार। सवैया मोहन सो अटक्यौ मनु री कल जाते परै सोई क्यों न बतावै। व्याकुलता निरखे बिन मूरति भागति भूख न भूपन भावै॥
देखे ते नेकु सम्भार रहै न तबै झुकि के लखि लोग लजावै । चैन नही रसखानि दुहूँ विधि भूली सबै न कछू बनि आवै ॥ १६८॥ शब्दार्थ—कल जातें परै = जिससे सुख हो । नेकु = तनिक । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरा मन कृष्ण से लग गया है जिसके कारण मैं सदैव व्याकुल रहती हूँ। मेरी यह व्याकुलता नष्ट हो और मुझे सुख मिले, ऐसी विधि मुझे कोई नहीं बताता । कृष्ण की मूर्ति को देखे बिना मुझे व्याकुलता रहती है। भूख भाग जाती है, अर्थात् कुछ भी खाने को मन नही करता और न आभूषण ही मुझे अच्छे लगते हैं। किन्तु जब मैं उन्हे देख लेती हूँ तो अपने को तनिक भी नहीं सँभाल पाती, तब उसके सामने मुझे झुकी देखकर लोग मुझे लज्जित करते हैं। रसखान कहते हैं कि मुझे दोनो प्रकार से चैन नही है। उनके देखने पर और न देखने पर मैं सब कुछ भूल जाती हूँ और उस समय मुझे कोई उपाय नहीं सूझता। सवैया भई बावरी ढूँढति वाहि तिया अरी लाल ही लाल भयौ कहा तेरो । ग्रीवा ते छूटि गयौ अबही रसखानि तज्यौ घर मारग हेरो ॥ डरियै कहै माय हमारी बुरी हिय नेकु न सूनो सहै छिन मेरो । काहे को खाइबो जाइबो है सजनी अनखाइबो सीस सहेरो ॥ १६६ ॥ शब्दार्थ—लाल = रत्न । लाल = कृष्ण । ग्रीवा = गर्दन, हृदय । माय = सासु । अनखाइबो = डाँट-फटकार । सहेरो = सहना ही पड़ेगी । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के विरह में पागल सी हो गई है । उसकी सखी उससे उस स्थिति का कारण पूछती है तो वह कुशलता से और बाते उसे बताती है । दूसरी सखी पूछती है कि हे सखि ! तुम पागल सी बनकर किसको ढूँढ रही हो ? वह उत्तर देती है—मेरे हार का रत्न टूट कर गिर गया है । वह अभी-अभी मेरी गर्दन से छूट कर गिर गया है । मैंने घर तक का मार्ग ढूँढ़ लिया है, लेकिन वह मिला ही नहीं । यह सुन कर उसकी सखी कहती है—तब इसमे डरने की क्या बात है ? वह उत्तर देती है—मेरी सासु बहुत बुरी है, वह मेरे हृदय को क्षणभर के लिए भी सूना नहीं देख सकती । अब तो उसका पाना-पाना क्या है । अब तो मुझे सासु की डाँट-फटकार सहनी ही पड़ेगी ।
विशेष-१ वाग्वैदग्ध्य की सुन्दर योजना है। २. लाल शब्द के प्रयोग मे यमक अलंकार है। सवैया मो मन मोहन कों मिलि कै सबहीं मुसकानि दिखाइ दई। वह मोहनी मूरति रूपमई सबही चितई तब ही चितई ॥ उन तौ अपने अपने घर की रसखानि चली विधि राह लई । कछु मोहि को पाप पर्यो पल मैं पग पावत पौरि पहार भई ॥ १७०॥ शब्दार्थ-रूपमई = सौन्दर्य युक्त । चितई = देखना । पग पावत पौरि पहार भई = पैदल अपने घर तक पहुँचना पहाड बन गया । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने अनुराग को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरा मन जब मोहन के मन से मिला; अर्थात् जब मुझे कृष्ण के प्रति प्रेम हुआ तो सारी सखियाँ मुस्करा दीं। वास्त- विकता तो यह है कि कृष्ण की सौन्दर्यमयी मूर्ति को जब सब अन्य सखियों ने देखा था तो मैंने भी देखा था । रसखान कहते हैं कि वे सब तो अपने-अपने घर अच्छी तरह से पहुँच गईं, पर मुझे ही पल भर मे यह पाप लगा है कि पैदल अपने घर तक पहुँचना मेरे लिए पहाड बन गया, अर्थात् बहुत कठिन हो गया। सवैया डोलिवो कुंजनि कुंजनि को अरु वेनु बजाइवो धेनु चरैवो । मोहिनी ताननि सो रसखानि सखानि के संग को गोधन गैवो ॥ ये सब डारि दिये मन मारि विसारि दयौ सगरौ सुख पैवो । भूलत क्यो करि नेहन ही को 'दही' करिवो मुसकाई चितैवो ॥ १७१॥ शब्दार्थ-वेनु = वेणु वंशी । मोहिनी = मोहित करने वाली । रसखानि = आनन्द-सागर कृष्ण । गोधन = गोचारण के गीत । अर्थ - एक गोपी अपने हृदय मे उमड़े हुए कृष्ण-प्रेम का वर्णन अपनी सखी से करती है कि आनन्द-सागर कृष्ण का कुन्ज-कुन्ज मे घूमना, वंशी बजाना गौएँ चराना, मोहित करने वाली ताने सुनाना, अपने साथियो के साथ गोचा- रण के गीत गाना, प्रेम से दही मांगना और मुस्करा कर देखना कैसे भूला जा सकता है ? अर्थात् कृष्ण की ये सब क्रीड़ाएँ मेरे मन मे गड़ गई हैं। इन्होने
व्याख्या भाग २६५ मेरे मन को अपने वश मे कर लिया है और इन्ही के कारण मेरा सारा प्राप्त किया हुआ सुख छू-मन्तर-हो गया है । सवैया प्रेम मरोरि उठै तब ही मन पाग मरोरनि मे उरभावै । रूसे से ह्रै दृग मोसो रहै लखि मोहन मूरति मो पै न आवै ॥ बोले बिना नहि चैन परै रसखानि सुने कल श्रौनन पावै । भौंह मरोरिबो री रुसिबो झुकिबो पिय सो सजनी सिखरावै ॥१७२॥ शब्दार्थ—पाग मरोरनि मे = पगडी के घुमावो मे। रूसे से = रूठे हुए से । श्रोनन = कान । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब भी वह अपनी पगड़ी के घुमावो मे मेरे मन को उलझाता है, तभी मेरा प्रेम सजग उठता है। मेरे नेत्र मुझसे रूठे हुए से रहते है और वे कृष्ण को देख कर मेरे वश मे नही रहते । कृष्ण की बाते सुने बिना मुझे चैन नही पडता, तथा उसकी बाते सुनने पर कानो को आनन्द प्राप्त होता है । यह सुन कर उसकी सखी ने प्रियतम से भौंह मोडने की, वक्र दृष्टि से देखने की, रूठने की तथा फिर मान जाने की शिक्षा दी । विशेष-अनुभावो की सुन्दर योजना है। सवैया बागन मे मुरली रसखान सुनी सुनिकै जिय रीझ पचैगौ । धीर समीर को नीर भरौ नहि माइ भकै श्रौ बबा सकुचैगौ ॥ आली दुरैधे को चोटनि नैम कहौ अब कौन उपाय बचैगौ । जायबौ भाँति कहाँ घर सो परसों वह रास परोस रचैगौ ॥१७३॥ शब्दार्थ—रीझि पचैगौ = प्रेम के वशीभूत हो जायेगा । धीर समीर = वृन्दावन का एक कु ञ्ज । भकै = झकझक करना । दुरैधे = निर्लज्ज । नैम = नियम । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपनी आसक्ति का सकेत देती हुई अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! बागो मे कृष्ण की मुरली की ध्वनि को सुन कर यह मन प्रेम के वशीभूत हो जायेगा । धीर समीर से पानी भरकर न लाने के कारण सास झक-झक करेगी और बाबा शर्म से सकुचा जायेगे । हे सखि ! उस निर्लज्ज कृष्ण की चोटो से कुल की मर्यादा का नियम किस प्रकार
२६६ रसखान-ग्रन्थावली बच सकता है ? अब घर से भी किस प्रकार कहाँ चली जाऊँ, क्योकि परसो ही वह हमारे पडौस मे अपनी रासलीला करेगा । विशेष—यह सवैया श्रीविश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया वेनु बजावत गोधन गावत ग्वालन सग गली मधि आयो । बासुरी मै उनि मेरोई नाँव सुग्वालिनि के मिस टेरि सुनायो ॥ ए सजनी सुनि सास के त्रासनि नन्द के पास उसास न आयो । कैसी करौं रसखानि नही हित चैनन ही चितचोर चुरायो ॥१७४॥ शब्दार्थ—मेरोई नाँव = मेरा ही नाम । मिस = बहाने से । त्रासनि = डर से । नद = ननद । अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कह रही है कि हे सखि ! बंशी बजाता हुआ, गोचारण के गीत गाता हुआ अन्य ग्वालो के साथ जब कृष्ण मेरी गली मे आया तो उसने सुग्वालिन के वहाने से बाँसुरी मे मेरा नाम बजाकर सुनाया । हे सजनी । अपने नाम को सुनकर मै तो सास के डर से इतनी डर गई कि मुझे अपनी ननद के पास भी ठीक तरह से साँस नही आये । आनन्द-सागर कृष्ण ने यह कैसी बात कर दी, इसमे मेरा भला नही है, क्योकि उस चितचोर ने मेरे सुख को भी चुरा लिया है, अर्थात् जब से बाँसुरी मे उसने मेरा नाम बजाया है, तब से मै उसके प्रेम मे इतनी डूब गई हूँ कि मुझे पलभर के लिए भी चैन नही मिलता । मेरा मन हर समय कृष्ण के लिए ही तडपता रहता है । सोरठा एरी चतुर सुजान, भयी अजान हि जान कै । तजि दीनी पहचान, जान अपनी जान कौं ॥ १७५ ॥ शब्दार्थ—सुजान = प्रिय । जान = जानकर । जानको = प्रिया को । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! वह चतुर प्रिय मुझे जानकर भी अजान बना हुआ है, अर्थात् उसने मेरी पूर्णतया उपेक्षा कर दी है । अपनी प्रिया मुझसे गहरा सम्बन्ध बनाकर भी वह आज मुझे पहिचा- नता भी नही है । विशेष—यमक, विरोधाभास अलकार ।
व्याख्या भाग २६७. सवैया पूरब पुंन्यनि ते चितई जिन ये अँखियाँ मुसकानि भरी जू । कोऊ रही पुतरी सी खरी कोऊ घाट डरी कोऊ वाट परी जू ॥ जे अपने घरही रसखानि कहै अरु हौसनि जाति मरी जू । लाल जे बाल विहाल करी ते निहाल करी न निहाल करी जू ॥१७६॥ शब्दार्थ—चितई=देखी । पुतरी=काठ की पुतली । हौसनि=प्रसन्नता- भरी लालसाएँ । बिहाल=व्याकुल । निहाल=प्रसन्न । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण की हँसी भरी आँखों को जो बालाएँ देख पाईं, यह उनके पूर्व जन्मो के पुण्यो का ही फल था । उन मुस्कान-भरी आँखों को देखकर कोई तो काठ की पुतली की तरह निश्चेष्ट खडी रही, कोई घाट पर डर गई और कोई अपनी सुधि-बुधि खोकर मार्ग मे ही पड गई । रसखान कहते है कि जो बालाएँ अपने घर थी, वे प्रसन्नता-भरी लालसाओ मे मरी जाती थी । कृष्ण ने जिन बालाओ को व्याकुल किया था, वस्तुत उन्हे व्याकुल न करके प्रसन्न किया था । सवैया आजु री नन्दलला निकस्यौ तुलसीवन ते बन कै मुसकातो । देखे बनै न बनै कहतै अब सो सुख जो मुख मै न समातो ॥ हौ रसखानि बिलोकिबे कौ कुलकानि के काज कियौ हिय हातो । आइ गई अलबेली अचानक ए भटू लाज को काज कहा तो ॥१७७॥ शब्दार्थ—नन्दलला=कृष्ण । तुलसीबन=वृन्दावन । बनकै=बन-ठनकर । हातो=दूर । भटू=सखी । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज बन- ठनकर मुस्कुराता हुआ कृष्ण वृन्दावन से निकला । उसकी शोभा न तो देखते बनती थी और न कहते बनती थी और उसे देखकर जो सुख प्राप्त हुआ, उसका वर्णन नही किया जा सकता । उस आनन्द-सागर को देखने के लिए सभी ब्रज-बालाओ ने कुल की लाज और मर्यादा को अपने हृदय से दूर कर दिया । हे सखि ! इतने मे ही, अचानक वह अलबेली आ गई तो फिर लाज का क्या काम था ? अर्थात् सभी कृष्ण के प्रति पूर्णतया अनुरक्त होकर अपनी लौकिक मर्यादाओ को भूल गई ।
२६८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया अति लोक की लाज समूह मै छोरि कै राखि थकी वहु सकट सो । पल मै कुलकानि की मेड नखी नहि रोकी रुकी पल के पट सो ॥ रसखानि सु केतो उचाटि रही उचटी न सकोच की औचट सो । अलि कोटि कियौ हटकी न रही अटकी अँखियाँ लट की लट सो ॥१७८॥ शब्दार्थ—समूह मै = भीड मे ही। मेड = सीमा। नखी = लाघ दी। पल के पट सो = पलक रूपी वस्त्र मे। उचाटि = व्याकुल। औचट = ठेस, चोट। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! भीड़ मे ही अत्यधिक लोक की लाज को छोडकर मै अत्यन्त सकटमे पड़कर थक गई, क्योकि उस समय भी मैं अपने मन को काबू मे न रख सकी। कृष्ण को देखते ही क्षणभर मे ही कुल की मर्यादा की सीमा मैने लाँघ दी, अर्थात् कुल-लाज को छोड दिया। मेरी दृष्टि पलको के वस्त्र मे भी नही रुक सकी। रसखान कहते है कि मैं चाहे जितनी व्याकुल रही, पर मैं सकोच की चोट से पृथक् न हो सकी, अर्थात् सकोच किये बिना न रह सकी। हे सखि ! मैने करोड़ो प्रयत्न किये, पर स्वय को न रोक सकी और मेरी आँखे कृष्ण की लटकती हुई कु तल-राशि मे उलझ गई। रास लीला कवित्त अधर लगाइ रस प्याइ बाँसुरी बजाइ, मेरो नाम गाइ हाइ जादू कियौ मन मैं । नटखट नवल सुघर नन्दनन्दन ने, करि कै अचेत चेत हरि कै जतन मैं । झटपट उलट पुलट पट परिधान, जान लागी लालन पै सबै वाम वन मै । रस रास सरस रँगीलो रसखानि आनि, जानि जोर जुगुति विलास कियौ जन मै ॥१७६॥ शब्दार्थ—नवल = युवक। सुघर = सुन्दर। जतन मैं = यत्नपूर्वक। पट = वस्त्र। वाम = स्त्री। सरस = आनन्द देने वाला। अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला का वर्णन करती हुई कहती