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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २३६ कै किनारो = सब से ही किनारा कर लिया, सबसे अलग हो गई । ठोकि नगारो = नगारा बजाकर । अर्थ —मुरली के प्रभाव का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! कल आनन्द-सागर कृष्ण के द्वारा मुरली मे लिया हुआ मेरा नाम जब मेरे कानो मे पडा तो उसी दिन से (उसी समय से) मेरे मन का धैर्य जाता रहा । सारे संसार को यह मालूम हो गया है कि मैने अपनी जान को झंझट पाल लिया है । कृष्ण से प्रेम करने के कारण अब तो मैं प्रत्येक गाँव मे बदनाम हो गई हूँ, इसीलिए सबसे अलग भी हो गई हूँ । इसीलिए हे सजनी ! मैं तुझ से फिर उसी बात को दोहराती हूँ कि कृष्ण ही मेरा प्रियतम है । इस बात को मै संसार मे नगारा पीटकर कह रही हूँ । विशेष—इस सवैये मे 'सब सो कै किनारो,' और 'ठोकि नगारो' मुहावरों का भावपूर्ण प्रयोग है । सवैया देखि हौ आँखिन सो पिय को अरु कानन सो उन बैन को प्यारी । बाके अनगनि रंगनि की सुरभीनि सुगन्धनि नाक मैं डारो ॥ त्यौ रसखानि हिये मैं धरौ वहि सांवरी मूरति मैन उजारी । गाँव भरौ कोउ नाँव धरौ पुनि साँवरी हो बनिहो सुकुमारी ॥१३०॥ शब्दार्थ—कानन सो = कानो से । सुरभीनि सुगन्धनि = नाना प्रकार को सुगन्धियो की गन्ध । मैन-उजारी = कामदेव से सुन्दर । नाव धरौ = नाम करो, निन्दा करो । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि मैं अब इन अपनी आँखो से केवल प्रियतम कृष्ण का ही दर्शन करूँगी और इन कानो से केवल उनकी प्रिय बासुरी को ही सुनूँगी । उसके बाँके कामदेव जैसी छवि की नाना प्रकार की सुगन्धियो की गन्ध को अपनी नाक मे डालूगी । इस प्रकार मै उस आनन्द सागर की कामदेव से भी सुन्दर मूर्ति को अपने हृदय मे धारण करूँगी । अब चाहे गाँव के सारे निवासी मेरी कितनी ही निन्दा करे मैं कृष्ण के प्रति अपने अचल अनुराग को नही छोड़ूँगी ।