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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२२८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया मोहन की मुरली सुनिकै वह वौरि ह्वै आनि अटा चढि झांकी। गोप बडेन की डीठि बचाइ कै डीठि सो डीठि मिली दुहुँ झांकी॥ देखत मोल भयौ अँखियान को को करै लाज कुटुम्ब पिता की। कैसे छुटाई छुटै अटकी रसखानि दुहुँ की विलोकनि वांकी ॥११३॥ शब्दार्थ—बौरी ह्वै = पागल होकर। विलोकनि वांकी = वक्र चितवन। अर्थ—गोपी प्रेम का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कह रह है कि कृष्ण की मुरली की तान को सुन कर वह पागल होकर अटारी पर चढ़ कर नीचे की ओर झाँकी। अन्य लोगो की निगाह बचाकर उसने कृष्ण से निगाह मिलाई। दोनो की आँखे मिली। आँखे मिलते ही दोनो मे प्रेम हो गया और उन्होने कुल की तथा पिता की लाज को तिलाजलि दे दी। रसखान कवि कहते है कि उन दोनो की परस्पर मिली हुई बाँकी चितवन किस प्रकार हटाने से हट सकती है अर्थात् उन दोनो का प्रेम नही टूट सकता। सवैया बसी बजावत आनि कढो सो गली मैं अली ! कछु टोना सो डारे। हेरि चिते, तिरछी करि दृष्टि चलौ गयो मोहन मूठि सी मारे॥ ताही घरी सो परी घरी सेज पै प्यारी न बोलति प्रानहुँ वारे। राधिका जी है तो जी है सबै न तो पीहै हलाहल नन्द के द्वारे ॥११४॥ शब्दार्थ—टोना = जादू। हेरि = देखकर। मूठि सी मारे = मूठ सी मार- कर। हलाहल = विष। अर्थ—प्रेम व्यथिता राधिका जी का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! बाँसुरी को बजाता हुआ वह कृष्ण अचानक गली मे आ निकला और राधा पर कुछ जादू सा डाल गया। वह उसकी ओर देखकर ध्यान देकर और तिरछी निगाह करके मन को मोहने वाली मूठ सी मार कर चला गया; अर्थात् राधा पर अपना प्रेम जगा कर और राधा के हृदय मे प्रेम की भावना जगाकर चला गया। वह प्यारी राधा उसी समय से सेज पर निश्चेष्ट होकर पडी हुई है। वह कुछ बोलती भी नही है तथा अपने प्राणो को न्योछावर करने पर उतारू है। हे सखि ! यदि राधा जी जीवित बच गई तो हम सबका जीवन है, यदि वह मर गई तो हम सभी नन्द के द्वारे

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