रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ रसखान-ग्रन्थावली मुख वाले, कामदेव के समान सुन्दर कृष्ण के मधुर वचनो ने मेरा मन मोह लिया है। उसकी बाँकी चितवन को देखकर मैं सज्ञा शून्य हो गई। आनन्द- सागर कृष्ण का मेरे हृदय मे बसा हुआ प्रेम मेरे शरीर को जलाता है। मैंने तभी से कुल की मर्यादा की सीमा छोड दी है और अब कृष्ण को प्राप्त करने के लिए वन-वन डोल रही हूँ, क्योकि व्रज के मन को मोहने वाला ब्रजराज कृष्ण बाँसुरी बजाता हुआ प्रतिदिन मेरी गली आता है। विशेष—'चद सो आनन' मे उपमा और 'मैन मनोहर' मे रूपक अलकार है। सवैया बाँकी विलोकनि रंगभरी रसखानि खरी मुसकानि सुहाई । बोलत बोल अमीनिधि चैन महारस-ऐन सुनै सुखदाई ॥ सजनी पुर-बीथिन मै पिय-गोहन लागी फिरै जित ही तित धाई । बाँसुरी टेरि सुनाइ अली अपनाइ लई ब्रजराज कन्हाई ॥११०॥ शब्दार्थ—विलोकनि = दृष्टि । रगभरी = प्रेमपूर्ण । रसखानि = आनन्द- सागर कृष्ण की । खरी = सुन्दर । बोल = वचन । अमीनिधि = अमृत का भंडार । चैन = आनन्द । महारस-ऐन = अत्यन्त आनन्द का भंडार । पुर-वीथिन मैं = नगर की गलियो मे । पिय-गोहन = कृष्ण के साथ । अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! उस कृष्ण की दृष्टि प्रेमपूर्ण है, वह आनद का सागर है, उसकी सुन्दर मुस्कान मन को मोहने वाली है। वह अमृत-भडार से युक्त वचनो को कहता है ; अर्थात् उसकी वाणी का माधुर्य अमृत के समान परमानन्द प्रदान करने वाला है। उसकी मधुर वाणी अत्यन्त आनन्द का भंडार है, जिसे सुनने से सुख प्राप्त होता है। हे सजनी ! नगर की गलियो मे समस्त ब्रज बालाएँ कृष्ण के साथ-साथ लगी हुई है। वह जिधर भी जाता है, सभी गोपियाँ उधर ही दौडने लगती है। हे सखी ! उस ब्रजराज कृष्ण ने बांसुरी की ध्वनि सुनाकर समस्त व्रज-बालाओ को अपने प्रेम के वशीभूत कर लिया है। विशेष—अनुप्रास, यमक अलकार ।