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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २२५ करियै उपायै बास डारियै कटाय, नाहिं उपजैगौ बाँस नाहिं बाजे फेरि बाँसुरी ॥१०८॥ शब्दार्थ—घट=घड़ा। वधि=वध करके, मार करके। अर्थ—कृष्ण की बाँसुरी के अपूर्व प्रभाव का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण ने जब बाँसुरी बजाई तो सारे ब्रज के काम बन्द हो गए। जो गोपियाँ यमुना नदी मे घुस कर पानी भरने वाली थी वे पानी मे खड़ी की खड़ी रह गईं और अपना घड़ा न भर सकी। जो मार्ग मे आ रही थी, वे वही रुक गईं, एक कदम भी आगे न रख सकी। जो घर मे थी, वे अपना सारा कार्य छोड़कर केवल लम्बे-लम्बे साँस भरने लगी। एक गोपी बांसुरी की धुनि को सुनकर तथा मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर गई, एक लोट-पोट हो गई, एक की आँखो से आँसू निकल आये। रसखान कहते है कि वह गोपी अपनी सखी से कहती ही गई कि कृष्ण तो सारी ब्रज-नारियो का वध करके बधिक बन गये और हम उसके प्रेम मे पड़- कर अपने कुल की हँसी का कारण बन गई। अब तो यही उपाय करना चाहिए कि दुनिया के सारे बाँसो को कटवा डालो। इससे न तो बाँस रहेगा और न फिर बाँसुरी बनकर हमे व्यथित करेगी। विशेष—१. कृष्ण की बाँसुरी.का प्रभाव-वर्णन अत्यन्त भावपूर्ण है। २. अतिम पक्ति मे लोकोक्ति का सुन्दर प्रयोग है। ३. डा० भवानीशंकर आशिक इस कवित्त को रसखानकृत नही मानते। अतः हमने इसे संदिग्ध छन्दो के अन्तर्गत भी रखा है। सवैया चद सो आनन मैन-मनोहर बैन मनोहर मोहत हौ मन। बक बिलोकनि लोट भई रसखानि हियो हित दाहत हौ तन॥ मैं तब तै कुलकानि की मैड़ नखी जु सखी अब डोलत हो बन। वेनु बजावत आवत है नित मेरी गली ब्रजराज को मौहन ॥ शब्दार्थ-आनन = मुख। मैन = कामदेव। हित = प्रेम। कुल-कानि की मैंड = कुल की मर्यादा की सीमा। अर्थ—बाँसुरी के प्रभाव से कृष्ण के प्रति उत्पन्न प्रेम की बात एक गोपी अपनी सखी को बताती हुई कह रही है कि हे सखि ! चन्द्रमा के समान सुन्दर