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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२२४ रसखान-ग्रन्थावली

हिस्सा दूध मे डाला जाता है, उसे जामन कहते हैं । पाइ = पाँव, चरण । रसखानि आनन्द-सागर कृष्ण । वारी = युवती ।छोहरा = पुत्र । बगराइ = बिखेरना । अर्थ—कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन कोई गोपी अपनी सखी से करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब कृष्ण ने बाँसुरी बजाई तो ब्रज की सारी व्यवस्था ही छिन्न-भिन्न हो गई । जो निकाला हुआ दूध गर्म था, वह ठंडा पड़ गया, इसीलिए वह जमाया न जा सका, क्योकि बाँसुरी की धुनि को सुनकर दूध जमाने वाली गोपी दूध जमाना ही भूल गई । जिस गोपी ने दूध को जमाने के लिए उसमे जामन लगा दिया था, वह उसे उचित स्थान पैर रखना भूल गई, अत वह रक्खा-रक्खा ही खट्टा हो गया । जब से आनन्द- सागर कृष्ण ने बाँसुरी की मधुर ताने सुनाई है, तब से ब्रजवासियो के हाथ पेर और ही हो गये हैं, अर्थात् उनके हाथ-पैर चलते ही नही । जो दशा आदमियों की है, वही दशा स्त्रियो की है, वही युवको और युवतियो की है। हे सखि ! मैं ब्रज की दुर्दशा का कहाँ तक वर्णन करूँ, बस इतना समझ लो कि सारा ब्रज ही व्याकुल हो गया । हे सखि ! पता नही, यशोदा-पुत्र ने बांसुरी बजाई थी या ब्रज मे विष बिखेरा था, जिसके कारण सारे ब्रज-बासियो की कर्मण्य- शक्ति ही नष्ट हो गई । विशेष—सदेह अलंकार । तुलना—'आन कहै आन करै आन हाथ पाइ भई, अनंग के अनख दही न सुधि तिय मे । सीरो तान तातौ कर तातो जान सीरो करै, दूध न जमायो जाइ नेह जम्यो हिय मे ।' —केशव. कवित्त जल की न घट भरै मग की न पग धरै, घर की न कछु करै बैठी भर साँसु री । एकै सुनि लोट गई एकै लोट-पोट भई , एकनि के दृगनि निकसि आए आँसु री । कहै रसखानि सो सबै ब्रज-बनिता वधि, बधिक कहाय हाय भई कुल हाँसु री ।