रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २०५ लाल सु जीव जिते रसखानि ते रगनि तोलनि मोलनि भारे । राधिका श्रीमुरलीधर की मधुरी मुसकानि के ऊपर वारे ॥७५॥ शब्दार्थ—कातिग=कातिक । सरोज=कमल । विकसात=खिलते हुए । रतनागर=रत्नो के भण्डार । दरके=फटे हुए । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से श्रीकृष्ण और राधा की मुस्कान का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैने कातिक और क्वार मास के प्रातःकाल मे कितने ही खिलते हुए कमलो को देखा है। अनेक रत्नो के भण्डार देखे है तथा फटे हुए अनेक अनारो के बिम्बो पर भी विचार किया है, पर राधा और कृष्ण की मुस्कान की शोभा के आगे ये नगण्य ही सिद्ध हुए है। रसखान कहते है कि इस भूमडल पर जितने भी प्राणी है उनसे कृष्ण के प्रेम की तोल और मूल्य भारी ही है । ये सब राधा और कृष्ण की मधुर मुस्कान के ऊपर मै न्योछावर करती हूँ । विशेष—तृतीय पंक्ति मे जीव का अर्थ बधूक भी किया जा सकता है ! सवैया बक विलोचन है दुख-मोचन दीरघ रोचन रं ग भरे है। घूमत बारुनी पान किये जिमि झूमत आनन रूप ढरे है ।। गडनि पै झलकै छवि-कुडल नागरि-नैन बिलोकि भरे है। बालनि के रसखानि हरे मन ईषद हास के पानि परे है ॥७६॥ शब्दार्थ — रोचन=लाल । वारुनी=शराब । नागरि-नैन=युवतियो के नेत्र । विलोकि=देखकर । ईषद=थोडी-सी । पानि परे है=हाथो मे पड गए है, वशीभूत हो गए है । अर्थ —कोई गोपी अपनी सखी से अपने-प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि कृष्ण के बॉके नेत्र दुख को दूर करने वाले है, विशाल है और लाल र ग (प्रेम) से भरे हुए है । वे ऐसे प्रतीत होते है मानो वे मुख के सौन्दर्य की शराब पीकर झूम रहे हो । उनके कपोलो पर कु डलो की शोभा छलकती है जिसे देखकर ब्रज की युवतियो के नेत्र उस शोभा मे उलझ जाते है । रसखान कहते है कि कृष्ण की थोड़ी-सी मुस्कराहट मे ही ब्रज-बालाओ के मन उस मुस्कराहट के वशीभूत हो गए हैं, अर्थात् उस मुस्कान के कारण ब्रज-वालाये कृष्ण के प्रेम मे बंध गई है ।