रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ रसखान-ग्रन्थावली कवित्त अब ही खरिक गई गाइ के दुहाइवे कों, बावरी ह्वै आई डारि ढोहनी यो पानि की । कोऊ कहै छरी कोऊ मौन परी डरी कोऊ, कोऊ कहै मरी गति हरी अँखियानि की ॥ सास व्रत ठानै नन्द बोलत सयाने धाड़, दौरि-दौरि मानै-जानै खोरि देवतानि की । सखी सब हँसै मुरझानि पहिचानि कहूँ, देखी मुसकानि वा अहीर रसखानि की ॥७७॥ शब्दार्थ—पानि = हाथ ! सयाने = जादू-टोना करने वाले । खोरि = मनौती । अर्थ—कृष्ण को देखकर कोई गोपी अपनी सुधि-बुधि खो बैठी है । इसी का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! अभी- अभी वह गौशाला मे गाय का दूध निकालने के लिए गई थी, लेकिन वह अपने हाथ के दूधपात्र को फेंक कर पागल होकर वापिस आ गई है। उसकी अवस्था को देखकर कोई तो यह कहती है कि किसी ने इसको छल लिया है, कोई कहती है कि यह स्तब्ध हो गई है, कोई कहती है कि यह डर गई है, कोई कहती है कि यह मर गई है और कोई कहती है कि इसकी आँखो की ज्योति ही नष्ट हो गई है । उसको अच्छा करने के लिए सासु अनेक प्रकार के व्रतो को करने का सकल्प करती है, नन्द दौड-दौड़कर सयानो को बोलकर लाती है और जाने-अनजाने देवताओ की मनौती करती है। सारी सखियाँ उसकी मूर्छा को पहिचान कर हँसती हैं और कहती है कि इसने आनन्द-सागर कृष्ण की कही मुस्कराहट को देख लिया है और यह उसी का प्रभाव है । सवैया मैन-मनोहर वन वर्जे सु सजे तन सोहत पीत पटा है । याँ दमकै चमकै झमकै दुति दामिनि की मनो स्याम घटा है । ए सजनी ब्रजराजकुमार अटा चढि फेरत लाल बटा है । रसखानि महा मधुरी मुख की मुसकानि करै कुलकानि कटा है ॥७८॥ शब्दार्थ—मैन = कामदेव । पटा = वस्त्र । दामिनि = बिजली । घटा =