रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २०७ गेंद । कटा = नष्ट । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का तथा तज्जन्य प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह कामदेव के समान मधुरवाणी बोलता है । उसके शरीर पर सुन्दर पीला वस्त्र सुशोभित है उसके शरीर की कांति इस प्रकार चमकती और झमकती है मानो काले बादल मे बिजली चमक रही हो । हे सजनी ! कृष्ण अटारी पर चढकर अपनी लाल गेंद को फेकते है । रसखान कहते है कि उसके मुख का भारी सौन्दर्य और उसकी मुस्कान कुल लज्जा को नष्ट कर देती है अर्थात् उसकी मुस्कराहट को देखकर ब्रज ललनाये उसके प्रेम मे इतनी आबद्ध हो जाती हैं कि वे अपने कुल की मान-मर्यादा का भी ध्यान नही रखती । विशेष—उत्प्रेक्षा अलकार । सवैया जा दिन ते मुसकानि चुभी चित ता दिन ते निकसी न निकारी । कुंडल लोल कपोल महा छवि कुंजन ते निकस्यौ सुखकारी ॥ हौ सखि आवत ही डगरे पग पैड तजी रिझई बनवारी । रसखानि परी मुसकानि के पाननि कौन गनै कुलकानि बिचारी ॥७६॥ शब्दार्थ—लोल = चंचल । डगरे = मार्ग मे । पैड़ = मार्ग । पाननि = हाथो मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जिस दिन से कृष्ण की मुस्कराहट मेरे मन मे चुभी है उस दिन से वह निकाले से नही निकलती । वह सुख देने वाला कृष्ण चंचल कुण्डलो को अपने कपोलो पर हिलाते हुए तथा अत्यन्त सौन्दर्य धारण किए हुए कुंजो से निकला था । हे सखि ! उसके मार्ग पर आते ही अर्थात् उसे देखते ही मैने अपना मार्ग छोड़ दिया और मै उस पर पूर्ण रूप से रीझ गई । अब तो मैं आनन्द-सागर कृष्ण की मुस्कान के हाथो मे पड गई हूँ । ऐसी स्थिति मे बेचारी कुल मर्यादा की गणना ही क्या है ? अर्थात् ऐसी स्थिति मे कुल-मर्यादा नही रह सकती । विशेष—अन्तिम पंक्ति मे मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है । पाठान्तर—इस सवैया की प्रथम पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है—