रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० रसखान-ग्रन्थावली सवैया मोरपखा सिर कानम कुण्डल कुंतल सो छवि गंडनि छाई। वंक विसाल रसाल विलोचन है दुखमोचन मोहन माई। आली नवीन महा घन सो तन पीट घटा ज्यौ पटा बनि आई। हौ रसखानि जकी सी रही कछु टोना चलाइ ठगौरी सी लाई ॥८४॥ शब्दार्थ-रसाल= आनन्द देने वाली। पटा = वस्त्र। टोना = जादू। ठगौरी = ठग विद्या। अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के सिर पर मोरपखो का मुकुट और कानो मे कुण्डल सुशोभित है। उनके केशो की शोभा उनके कपोलो पर बिखरी हुई है। उनकी वक्र दृष्टि आनन्द देने वाली और विशाल है। वह दुख को दूर करने वाली तथा मन को मोहने वाली है। हे सखि ! उनका श्याम शरीर नवीन विशाल वादल के समान है जिस पर पीले वस्त्र की शोभा बहुत ही प्रभावशाली है। रसखान कहते है कि मैं उनकी शोभा को देखकर स्तब्ध-सी रह गई और उसने मेरे ऊपर कुछ जादू-सा करके मुझे ठग लिया। विशेष-तृतीय पक्ति मे उपमा अलकार है। सवैया जा दिन ते वह नन्द को छोहरा या वन धेनु चराइ गयौ है। मोहिनी ताननि गोधन गावत वेनु वजाइ रिझाइ गयौ है। वा दिन सो कछु टोना सो कै रसखानि हिये मैं समाइ गयौ है। कोऊ न काहू की कानि करै सिगरो व्रज वीर । विकाइ गयौ है ॥८५॥ शब्दार्थ-छोहरा = पुत्र। गोधन = गोचारण के गीत। टोना = जादू। कानि करै = लज्जा करती है। वीर = सखी। अर्थ-एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! जिस दिन से वह नन्द-पुत्र कृष्ण इस वन मे गाये चरा कर गया है, मधुर तानो के साथ बंशी बजाकर तथा गोचारण के गीत गाकर रिझा गया है, उस दिन से कुछ जादू-सा करके वह आनन्द-सागर कृष्ण हृदय मे समा गया है। इसलिए यहाँ पर कोई स्त्री भी किसी की लज्जा नही करती। वास्तविकता तो यह है कि सारा व्रज ही उसके हाथों विक गया है; अर्थात् व्रज के सब नर-नारी पूर्ण- रूप से कृष्ण के वश मे हो गये हैं, उसे प्रेम करने लगे हैं।