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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २०६ खाकर। सुमार = भयंकर मार। डोरी = ढोल। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखि से कहती है कि हे सखि ! आज मैंने कृष्ण को कुंजो की छाया मे खडे हुए देखा था। उसके विशाल नेत्रो का दृष्टि-रूपी बाण मेरे हृदय के हृदय को भी छेद गया। उस बाण की भयंकर मार से मै घायल होकर तथा चक्कर खाकर पृथ्वी पर गिर पडी और मुझे अपने अंगो को भी संभालने का होश नही रहा। इतनी सी घटना घटित होने पर ही उसकी मुस्कान का, हम दोनो के प्रेम का, ढोल समूचे व्रज मे बज गया। अब तुम्ही बताओ कि हम जैसी अबलाएं इस व्रज को छोडकर और कहाँ जाये। दोहा ए सजनी लोनो लला, लखौ नन्द के गेह। चितयौ मृदु मुसकाइ कै, हरी सबै सुधि देह ॥८२॥ शब्दार्थ—लोनो=सुन्दर। लखौ=देखा। गेह=घर। हर=हरण कर ली, प्रसन्न हो गई। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छबि का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सजनी ! मैंने नन्द के घर मे सुन्दर कृष्ण को देखा। उसने जब मधुर मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा तो उसने मेरे शरीर की सारी सुधि का हरण कर लिया; अथवा मेरा रोम-रोम प्रसन्नता से खिल उठा। विशेष—अन्तिम चरण मे श्लेष अलंकार है। कृष्ण-सौन्दर्य दोहा जोहन नन्दकुमार को, गई नन्द के गेह। मोहिं देखि मुसकाइ कै, वरस्यौ मेह सनेह ॥८३॥ शब्दार्थ—जोहन=देखने के लिए। गेह=घर। सनेह=प्रेम। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण को देखने के लिए मै नन्द के घर गई थी। मुझे देखकर कृष्ण मुस्करा दिया। उसकी मुस्कराहट से प्रेम का मेह बरसा ! अर्थात् मै उसके प्रेम मे आबद्ध हो गई। विशेष—रूपक अलंकार।