रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ३ रीतिबद्धमार्गी शाखा की निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती है— १. शृंगारिकता २. आलंकारिकता ३. भक्ति और नीति ४ काव्यरूप ५. ब्रजभाषा की प्रधानता ६. जीवन-दर्शन का अभाव १. शृंगारिता—रीतिकाल मे शृंगार-वर्णन की प्रधानता रही है । इसी प्राधान्य के कारण कतिपय विद्वान् इस काल को ‘शृंगार काल’ कहना उप- युक्त समझते है । शृंगार-रस का जितना सूक्ष्म विवेचन इस काल मे हुआ है, उतना किसी काल मे नही हुआ । इस प्रवृत्ति का मुख्य कारण तत्कालीन राज- नीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ है । कवियो का ध्येय अपने आश्रयदाता का मनोरजन करना होता था और मनोरजन के लिए शृंगार के अलावा और क्या विषय उपयुक्त हो सकता है । भक्तिकाल मे माधुर्य भक्ति का जो अबाध स्रोत बहा और उसमे जिस शृंगार को अलौकिक रूप दिया गया, वही रीति- काल मे आकर लौकिक और मांसल बन गया । प्रथम दर्शन से लेकर सुरतांत तक के चित्रों का इस काल के कवियो ने बडे मनोयोग से चित्रण किया । इसी कारण इनकी दृष्टि मे प्रेम और नारी का स्वस्थ स्वरूप न आ सका । डॉ० भागीरथ मिश्र के शब्दो मे— ‘शृंगारिकता के प्रति उनका (रीतिकालीन कवियो का) दृष्टिकोण मुख्यतः भोगपरक था, इसीलिए प्रेम के उच्चतर सोपानो की ओर वे न जा सके । प्रेम की अनन्यता, एकनिष्ठता, त्याग, तपश्चर्या आदि उदात्त पक्ष भी उनकी दृष्टि मे बहुत कम आए है । उनका विलासोन्मुख जीवन और दर्शन सामान्यतः प्रेम या शृंगार के बाह्य पक्ष शारीरिक आकर्षण तक ही सीमित रहकर रूप को मादक बनाने वाले उपकरण ही जुटाता रहा । यह प्रवृत्ति नायिका-भेद, नख- शिख वर्णन, ऋतु-वर्णन, अलंकार निरूपण सभी जगह देखी जा सकती है ।’ २. आलंकारिकता—रीतिकालीन कवियो के काव्य के दो प्रमुख उद्देश्य थे—मनोरंजन और पांडित्य-प्रदर्शन । आलंकारिकता का प्राधान्य इन दोनो ही कारणो से रीतिकालीन काव्य मे समाविष्ट हुआ ।, यह सच है कि काव्य मे