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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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४ रसखान-ग्रन्थावली

अलंकारों को उसकी शोभा के आधार पर धर्म माना गया है और यदि उनका समुचित प्रयोग किया जाए तो काव्य प्रभाव एवं भावप्रेषणीयता में बहुत सीमा तक सहायक सिद्ध होते हैं। किन्तु रीतिकालीन कवियों ने अलंकारों का प्रयोग प्राय चमत्कार-प्रदर्शन के लिए ही किया, इसलिए इस काल में श्लेष और यमक जैसे श्रमसाध्य अलंकारों का बोलबाला रहा। उन कवियों ने चमत्कार के प्रति अपना इतना गहन प्रलोभन दिखाया है कि यदि रस और चमत्कार में से उन्हें एक को ग्रहण करने का अवसर आया है तो उन्होंने चमत्कार को ही ग्रहण किया है। ३. भक्ति और नीति - जो भक्ति भक्तिकाल में कवियों का साध्य थी, वही इस काल में आकर साधन बन गई। इन्होंने राधा और कृष्ण को लौकिक धरातल पर ला खड़ा किया और तब ये साधारण नायिका और नायक बनकर रह गए। भक्ति के प्रति इस काल के कवियों का कोई रुझान नहीं था और न ये ऐसे वातावरण में ही थे जो भक्ति के अनुकूल पड़ता है। फलतः राधा और कृष्ण के माध्यम से इन्होंने शृंगारिकता की ही अभिव्यक्ति की है। डॉ० नगेन्द्र के शब्दों में - 'यह भक्ति भी उनकी शृंगारिकता का अंग थी। जीवन की अतिशय रसिकता से जब ये लोग घबड़ा उठते होंगे तो राधा-कृष्ण का यही अनुराग उनके धर्मभीरु मन को आश्वासन देता होगा। इस प्रकार रीतिकालीन भक्ति एक ओर सामाजिक कवच और दूसरी ओर मानसिक शरणभूमि के रूप में इनकी रक्षा करती थी। तभी तो ये किसी तरह उनका अंचल पकड़े हुए थे। रीतिकाल का कोई भी कवि भक्तिभावना से हीन नहीं है-- हो भी नहीं सकता था, क्योंकि भक्ति उसके लिए एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता थी। भौतिक रस की उपासना करते हुए उसके विलास-जर्जर मन में इतना नैतिक बल नहीं था कि भक्तिरस में अनास्था प्रकट करने का उसका सैद्धांतिक निषेध करते। इसलिए रीतिकाल के सामाजिक जीवन और काव्य में भक्ति का आभास अनि- वार्यत वर्तमान है और नायक-नायिका के लिए बार-बार हरि और राधिका शब्दों का प्रयोग किया गया है।' जहाँ तक नीति का सम्बन्ध है, इस विषय में इन लोगों ने जो कुछ लिखा है, वह यथार्थ और व्यावहारिक है। वस्तुतः इनका वातावरण भक्ति की