रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ रसखान-ग्रन्थावली थी । वे तो जीवन के केवल उसी भाग को ग्रहण करते थे जिसमें कल्पनाओ की उड़ाने और वासना की थिरकनें थी, युवावस्था से युक्त जीवन ही रीतिकालीन कवियो का प्रतिपाद्य था । प्रो० भगीरथ मिश्र के शब्दो मे— 'ऐसे लगता है कि रीति कविता के रचियता यौवन और वसन्त के कवि है । जीवन का फूलता हुआ सुघर रूप ही उन्हें प्रिय है । पतझड, सघर्ष और विनाश सम्भवत स्वतः जीवन मे इतने घोर रूप मे विद्यमान था कि कवि काव्य मे भी उसको उतारकर नैराश्य और निवृत्ति की भावना को जगाना नही चाहता है । वह तो फूलते-फलते जीवन का भ्रमर है । उसने जीवन का एक ही स्वरूप लिया, एक ही पक्ष लिया, यह इस धारा के कवि की संकीर्णता है, दुर्बलता है, और एकागिता है, परन्तु जिस पक्ष को उसने लिया है उसके चित्रण मे उसने कोई कसर उठा नही रखी । उसके समस्त वैभव और विलास के चित्रण मे उसने कलम तोड़ दी है ।' यही कारण है कि रीतिकालीन कवि के पास न तो कोई स्वस्थ जीवन है और न कोई जीवन-दर्शन है । रीतिकाल की दूसरी काव्यधारा रीतिमुक्त कवियो की है । घनानंद, आलम, बोधा, रसखान आदि इस धारा के प्रमुख कवि है । ये कवि न तो किसी परम्परा से सबद्ध है और न किसी काव्यशास्त्रीय नियमन से । ये भावावेश के कवि है। इनके मन मे जो भी भाव स्फुरित होता है, उसे ये अत्यन्त सबल एव प्रभावोत्पादक अभिव्यंजना के माध्यम से प्रकट करते है । इनके अपने सिद्धात, अपनी रीति और अपनी अभिव्यंजना शैली है । इनको तो वही व्यक्ति समझ सकता है जो ब्रजभाषा का अधिकारी विद्वान् होने के साथ-साथ महास्नेही हो । रसखान का सम्बन्ध इसी धारा से है, अतः इस धारा का परि- चय प्राप्त करना आवश्यक है । भक्ति के युग के पवित्र ब्रह्मद्रव की धारा को पार कर जब हिन्दी के कवियो ने तनिक सामने की ओर अपनी दृष्टि दौड़ाई तो हरे-हरे लता-कुंजो, कदम्ब के घने वृक्षों तथा हरियाली से भरे फूलों वाली निर्मल जल की धारा ने उनके मन को अपनी ओर आकर्षित कर लिया, फिर क्या था, वही उनका मन "श्याम ह्वै समान्यो, यमुना यमुन जल तरंग मे" कवियो के लिए कविता का एक नया सुन्दर मार्ग मिल गया । यहाँ कविता की शैली में एक