रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ७ नूतन परम्परा का आविष्कार हुआ । आगे चलकर इस नवीन परम्परा को रीतिकाल के नाम से अभिहित किया गया । हिन्दी-साहित्य का यह रीतिकाल सभी दृष्टियो से ऊँचा और आदर्श माना जाता है । इस युग मे कविता करने की एक ऐसी प्रणाली बन गई, जिसका अवलम्ब सभी परवर्ती कवियो ने लिया । सच पूछा जाए तो भाषा, शैली और विषय तीनो दृष्टियो से यह काल एक ऐसा राजमार्ग बना, जिस पर चलकर तत्कालीन कवियो को कविता करने मे विशेष सुविधाएँ मिली । इस युग मे कविता-पद्धति के हम दो विभिन्न रूप देखते हैं । एक रीतियुक्त और दूसरा रीतिमुक्त । रीतियुक्त कवियो ने काव्य के लक्षण-ग्रन्थो के आधार पर कविताएँ लिखी पर रीतिमुक्त कवियो ने स्व- तन्त्र रूप से अपनी रचनाएँ उपस्थित की । इन कवियो मे से प्रमुख कवि घनानन्द थे । सच पूछा जाए तो इन कवियो की स्थिति रीतिकाल मे उसी प्रकार की थी जिस प्रकार कमल की स्थिति जल मे होती है । सूक्ष्म रूप से इनके काव्य का अध्ययन करने से इस बात की प्रामाणिकता स्पष्ट हो जाती है । रीतिकालीन कविता का राजमार्ग आद्योपान्त शृंगार रस से अभिसिंचित है, इसमे संभवत तो किसीको भी सन्देह नही, पर रीतिमुक्त कवियो ने इस पथ पर जहाँ तक सचरण किया भक्ति के, अगर, धूप, चन्दन से उसे पवित्र कर दिया । इनकी कविता केवल शृंगार की वशी-ध्वनि ही नही, अपितु भक्ति की खञ्जडी भी मुखरित सुनाई पडती है । इन्होने शृंगार के साथ भक्ति का मिश्रण करके बिहारी के 'श्याम हरित द्युति होय' से कुछ कम कमाल नही किया । दो शब्दो मे यदि हम रीतिमुक्त कवियो को रीति पर- म्परावादी कवियो मे भक्त कवि मान ले तो अधिक युक्तिसंगत होगा । इस परम्परा के अन्तर्गत घनानन्द, बोधा, आलम, निवाज, ठाकुर आदि प्रमुख हैं । इस धारा के कवियो के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ या सामान्य प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं:— १. काव्य-रचना का प्रेरणा स्रोत निजी जीवन :—यद्यपि इन कवियों मे से कुछ का संबंध विभिन्न राजाओं के दरबार से भी रहा । किन्तु फिर भी इन्होंने केवल अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के