रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 27, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें८ रसखान-ग्रन्थावली लिए काव्य-रचना नही की । इनकी काव्य-रचना का प्रेरणा स्रोत इनका वैयक्तिक जीवन ही था । इन्होने अपने जीवन मे प्रेम और विरह की ऐसी अनुभूतियाँ प्राप्त की जिन्होने इनको काव्य-रचना के लिए विवश कर दिया । यह कविता नही लिखते थे, अपितु कविता स्वत ही इनकी अनुभूतियो से प्रेरित होकर उच्छ्वसित हो जाती थी । घनानन्द ने लिखा है— “लोग है लागि कवित्त बनावत, मोहि तो मेरे कवित्त बनावत ।” इसी प्रकार इस धारा से अन्य कवियो ने भी प्रयत्नपूर्वक कविता नही लिखी, अपितु उसमे उनकी भावनाओ के सहज स्वाभाविक उद्गार हैं । इनके बहुत से समकालीन कवि रीति के लक्षणो को ध्यान मे रखकर कविता करते थे, जो इन्हे पसन्द न थी । ठाकुर ने ऐसे कवियो की आलोचना करते हुए लिखा है— “सीखि लीनो मीन मृग खंजन, कमल नयन, सीखि लीनो जस और प्रताप को कहानो है ।” इससे स्पष्ट है कि इस धारा के कवियो ने कविता के वास्तविक महत्व को समझा था । यही कारण है कि इनकी कविता मे बाह्य शरीर के चित्रण के स्थान पर हृदय की सच्ची पुकार मिलती है । २ स्वच्छन्द प्रेमः—जो प्रेम समाज की मर्यादाओ के प्रतिकूल हो, उसे स्वच्छन्द प्रेम का नाम दिया जाता है । हिन्दी के इन कवियो का प्रेम भी स्वच्छन्द प्रेम की कोटि मे आता है । इन कवियो ने जाति, समाज और धर्म की अनुयायिनी ली । घनानन्द की सुजान, बोधा की सुभान, आलम की शेख, आदि नायिकाएँ जाति की मुसलमान थी । ऐसी स्थिति मे इन कवियो को प्रेम के क्षेत्र मे विविध कठिनाइयो का सामना करना पडा । मित्रो का उपहास, समाज की निन्दा और आश्रयदाताओ के विरोध का उन्हे सामना करना पडा । उन्हे जीवन मे अनेक कष्ट सहने पडे, किन्तु फिर भी वे अपने प्रेम-मार्ग से पीछे नही हटे । उनके प्रेम मे सच्चाई और एकोन्मुखता के दर्शन होते है । बोधा के शब्दो मे वे अपनी प्रेयसी के लिए संसार के वैभव को ठुकराने के लिए सहर्ष प्रस्तुत है— “एक सुभान के आनन पे, कुरबान जहाँ लगि रूप जहाँ को । जानि मिले तो जहान मिले, नहि जान मिले तो जहान कहाँ को ॥”