रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० रसखान-ग्रन्थावली
लता अभिव्यक्त नही हो पाती । वियोग पक्ष मे कवि की दृष्टि अन्तर्मुखी होती है । वह प्रेमानुभूति को स्वय प्रेमी बनकर प्रकट करता है । अतः उसकी विरह- उक्तियाँ हृदय के अन्तस्तल से सच्ची प्रकार से प्रकट होती है । वह प्रेम की अतुल गहराइयो तक बैठने को आतुर रहता है । वियोग की अमिट प्यास हृदय को सदा द्रवित रखती है । विरह मे अनुभूति का स्वरूप अधिक तीव्र होता है । अतः उनकी विरह विषयक धारणा अधिक विलक्षण है । वस्तुत इनकी प्रेम तृपा सदा बढती ही रहती है । इनमे विरह का मार्मिक चित्रण है और निजी प्रेम की पीर का प्रदर्शन सच्चे रूप मे मिलता है । आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने इन कवियो को सूफियो से प्रभावित माना है । उनका यह विश्वास है कि इनके काव्यो मे वर्णित प्रेम-पीर फारसी काव्य-धारा का प्रभाव है जो कि सूफियो के माध्यम से आया है । उनके ही शब्दो मे "इन स्वच्छन्द कवियो ने फारसी काव्यगत वेदना की निवृत्ति के साथ इस प्रेम-पीर का स्वागत किया । इनकी रचना मे वियोग के आधिक्य का कारण यही है । लौकिक पक्ष मे इनका विरह निवेदन फारसी काव्य की वेदना की विवृत्ति से प्रभावित है और अलौकिक पक्ष मे सूफियो की प्रेम-पीर से ।" रीतिमुक्त कवियो ने विरह का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन नही किया है । वह नायिका को रीतिबद्ध कवियो की तरह इतनी जलती हुई नही दिखाता कि "उस पर गुलाब जल की शीशी औंधा दी जाए तो वह भाप बनकर उड़ जाएगी ।" परन्तु रीतिमुक्त कवि इन सब अन्तर्दशाओ का चित्रण आंतरिक शैली से करता है । इन्होने कृष्ण के सगुण सलौने रूप को अपने काव्य का विषय बनाया है, अत इन्होने कृष्ण और राधा के सयोग पक्ष के प्रेम की भी बडी मनोहारी और मार्मिक झाँकियाँ प्रस्तुत की है । इनका प्रेम वासना-पकिल न होकर स्वच्छ चमत्कार प्रदर्शन है । सक्षेप मे कहा जा सकता है कि इनका प्रेम वहिर्मुखी न होकर अन्तर्मुखी अधिक है । उसमे हृदय की मार्मिक सूक्ष्म अनुभूतियो और सौन्दर्य की महीन से महीन बारीकियाँ है । वस्तुतः ये प्रेम हृदय और सौन्दर्य के सच्चे पारखी है । ५ भक्ति का स्वरूप - इन कवियो ने राधा और कृष्ण की लीलाओ का उन्मुक्त गान किया है, किन्तु इतने भर से इन्हे कृष्णभक्त कवि सूरदास