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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ११ आदि की कोटि में नही रखा जा सकता। क्योकि लगभग सभी रीतिकालीन कवियो का यह कथन है— आगे के सुकवि रीझि है तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है।' इनको शुद्ध रूप से भक्त कवि नही कहा जा सकता क्योकि इनका प्रमुख उद्देश्य शृंगार-वर्णन था। इसीलिए इन्होने भगवद् भक्ति की ओर से अश्लील एवं असंस्कृत चित्र प्रस्तुत किए। आचार्य विश्वनाथप्रसाद के अनुसार पहले इनकी रुचि रीतिबद्ध रचना की ओर दिखाई देती है। दूसरे रूप मे इन्होने स्वच्छन्द रूप से प्रेम के पवित्र क्षेत्र में पदार्पण किया। तीसरे मे इनकी रचनाएँ भक्तिपरक हो गईं।" आगे वह लिखते हैं कि यदि भक्त कहे बिना सतोष न मिले तो इन्हे उन्मु- क्त भक्त कवि मान लिया जा सकता है। इनका भक्त कवियो से पार्थक्य इनकी स्वच्छन्द प्रकृति द्वारा ही हो जाता है। दूसरा इन्होने भक्त कवियो द्वारा त्याज्य विषयों को "प्रिय की वास्तविक कठोरता" आदि का वर्णन विस्तार से किया है। इनकी भक्ति मे साम्प्रदायिकता एव संकीर्णता की भावना नही है। उन्होने अनेक देवी-देवताओ के प्रति उदार आस्था प्रदर्शित की है। रसखान और घना- नंद को ही इस भक्त कोटि मे रखा जा सकता है। ६. प्रकृति चित्रण—प्रायः सभी कवियो ने हिन्दी-साहित्य के प्रथम तीन कालो मे प्रकृति-चित्रण को उपेक्षित रखा है। परन्तु रीतिकाल मे दृष्टि शृंगारपरक होने के कारण शृंगारिक चित्रण मे अधिक रमी इसलिए उनकी दृष्टि भी इसके वर्णन से दूर हट गई। रीतिकाल मे प्रकृति का चित्रण उद्दीपन रूप मे हुआ है। सेनापति की रचना मे प्रकृति कही-कही उद्दीपन के वधन से मुक्त अवश्य मिल जाती है। विरह वारीश मे बोधा मे प्रकृति वर्णन कुछ तो गास्त्र वद्ध और कुछ स्वच्छन्द वृतिबद्ध रखा है। ७. लोक-जीवन का ग्रहण — स्वच्छन्दमार्गी कवियों ने लोक-जीवन के मगल मोद पक्ष को भी लिया है। प्रसिद्ध पर्व त्यौहारो पर रीतिमुक्त शैली में उत्तम रचनाएँ की है। अखतीज, हरियाली तीज, झूला, वट पूजन आदि अनेक त्यौहार ठाकुर के काव्य मे वर्णित हुए है। ८. काव्य पद्धतिः—स्वच्छन्द कवियों ने रीति का निर्वाह आरम्भ में स्वीकृत