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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१२ रसखान-ग्रन्थावली करके बाद मे त्याग दिया । रीतियुक्त, रीतिबद्ध सभी कवियो मे नेत्र व्यापार सम्बन्धी सभी उक्तियाँ समान रूप से पाई जाती हैं। राजाश्रित कवि ने तो उर्दू या फारसी के काव्यरचना के रकीबो और माशूको की जोड-तोड मे खण्डिता को पेश किया । यहाँ पर ये कुछ रीतिबद्ध कवियो के समीप आ जाते हैं। स्वच्छन्द कवियो ने खंडिता नायिका के द्योतक चिन्हो के ब्योरे प्रस्तुत न करके उसके हृदय को दिखलाने का प्रयत्न किया । सुरतात या विपरीत रति के कुत्सित चित्र प्रायः इन कवियो मे नही मिलते हैं। जो मिलते हैं वह भी उस समय के जब इन कवियो ने इस मैदान प्रवेश किया था । बोधा मे कही-कही बाजारू ढग अवश्य मिलता है । ६. मुक्तक शैली :- वैसे तो समूचे रीतिकाल मे मुक्तक शैली की ही प्रधानता पाई जाती है । परन्तु फिर भी कभी-कभी फुटकल रूप मे प्रबन्ध काव्यो की रचना होती रही । आलम ने "माधवानल' 'कामकदला' 'सुदामा चरित्र' और श्याम स्नेही, बोधा ने 'विरह वारीश' नामक प्रबन्ध काव्य प्रस्तुत किए । १०. छन्दालंकार :- इस धारा मे अधिकांशतः कवित्त, सवैया और दोहा जैसे छन्दो का प्रयोग किया गया । यद्यपि बीच-बीच मे छप्पय, व रवै हरिपद आदि छन्दो का प्रयोग किया गया है किन्तु सभी रीति-कवियो की वृत्ति अधिकतर दोहा-सवैया और कवित्त मे रमी है। रीतिमुक्त धारा के कवियो ने अलकारो का प्रयोग अपने प्रकृत रूप मे किया है। इनके यहाँ अल- कार साधन रूप मे आए हैं न कि साध्य के रूप मे । ११ भाषा :- भाषा का परिमार्जन और व्यवस्थापन भी इन स्वच्छन्द कवियो के द्वारा ही हुआ है। क्योकि रीतिबद्ध कवियो के पास इतना अवकाश होते हुए भी उन्होने भाषा को व्यवस्थित करने का प्रयास नही किया । मति- राम और पद्माकर को छोडकर दूसरे कवियो मे भाषा की सफाई के दर्शन नही होते । भूषण और देव आदि ने स्वेच्छा से शब्दो को तोडा-मरोडा है। इनकी भाषा मे प्रादेशिकता की पुट भी बनी रही । परन्तु रीतिमुक्त कवियो मे न तो भाषा के अंग भंग की प्रवृत्ति और न ही प्रादेशिकता का ही पुट है। रसखान और घनानन्द ने तो ब्रज भाषा का ऐसा प्रयोग किया है जिसमे ब्रज भाषा