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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२६८ रसखान-ग्रन्थावली सोरठा अरी अनोखी बाम, तू आई गौने नई । वाहर धरसि न पाय, है छलिया तुव ताक मैं ।२२४। शब्दार्थ—अनोखी=सुन्दर । वाम=स्त्री । छलिया=कृष्ण । तुव ताक मैं=तेरी खोज मे । अर्थ—ब्रज मे आई किसी नई गोपी को अन्य गोपी चेतावनी देती हुई कहती है कि हे सुन्दर नारी ! तू नई-नई गौने मे आई है, अत यहाँ की बातो को नही जानती । तू अपने घर से बाहर पैर न रखना, क्योकि कृष्ण तेरी खोज मे है । यदि तू उसे मिल गई तो वह तुझे अपने प्रेम-बन्धन मे बाँध लेगा । संयोग-वर्णन सवैया विहरै पिय प्यारी सनेह सने छहरै चुनरी के फवा कहरै । सिहरै नव जोवन रग अनग सुभग अपागनि की गहरै ॥ वहरै रसखानि नदी रस की लहरै वनिता कुल हू भहरै । कहरै विरही जन आतप सो लहरै लली लाल लिये पहरै ॥२२४।॥ शब्दार्थ—सनेह सने=प्रेम पूर्वक । फवा=फुंदने । फहरै=गिरते हैं । सुभग=सुन्दर । अपागनि=नेत्रो की कोरे । कहरै=दुखी होते हैं । आतप= विरह दुख । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण प्रिया राधा के साथ प्रेमपूर्वक विचरण करते है जिसकी चुनरी के फु दने छहर कर गिरते है । सुन्दर नेत्र-कोरो की गंभीरता से उसका नव-यौवन सिहरता है तथा प्रेम के कारण काम-भावना उत्पन्न होती है । रसखान कहते है कि वहाँ पर आनन्द की नदी वहती है जिसके किनारो पर खडी ब्रज-वालाएँ कांपती है । उसके कारण विरही जनो का विरह दुख बढता है और वे उससे दुखी होते है तथा कृष्ण राधा के साथ प्रसन्न हो रहे है । विशेष—अनुप्रास अलकार ।